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Lakshmi Aarti for Diwali Pooja – Lakshmi Aaradhana Aarti


Lakshmi Aarti for Diwali Pooja

                                  Lakshmi Aarti

lakshmi aarti

 

Jai lakshmi maataa, Maiyaa jaya lakshmi maataa
Tumako nishadina dhyaavata, Hara vishnu vidhaataa ||

Brahmaanii, rudraanii, kamalaa, Tuuhii hai jaga maataa
Suurya chandramaa dhyaavata, Naarada rishi gaataa ||

Durgaa ruupa nirantara, sukha sampati daataa
Jo koi tumako dhyaavata, riddhi siddhi dhana paataa ||

Tuuhii hai paataala basantii, Tuuhii shubha daataa
Karma prabhaava prakaashaka, Jaganidhi ke traataa ||

Jisa ghara mein tuma rahatii, saba sadaguna aataa
Kara sake koii kara le, mana nahin ghabaraataa ||

Tuma bina yagya na hove, Vastra na koii paataa
Khaana paana kaa vaibhava, Saba tumase hii aataa ||

Shubha guna mandira sundara, Kshirodadhi jaataa
Ratana chaturdasha tuma hii, Koii nahiin paataa ||

Aartii lakshmii jii kii, Jo koii nara gaataa
Ura aananda umanga ati, Paapa utara jaataa ||

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आरती संग्रह – Aarti for Gods for various Festivals like Ganesh Chaturthi


आरती संग्रह
श्री गणपतीची आरती
सुखकर्ता दु:खहर्ता वार्ता विघ्नाची | नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जायची | सर्वांग सुंदर उटी शेंदुराची | कंठी झळके माळ मुक्ताफळाची | जयदेव जयदेव जय मंगलमूर्ती | दर्शनमात्रे मन:कामना पुरती जय देव जय देव || धृ || रत्नखचित फार तुज गौरीकुमरा | चान्दांची उटी कुंकुमकेशरा | हिरेजडीत मुगुट शोभती बरा | रुणझुणती नुपुरे चरणी घागरिया || जय || २ || लंबोदर पितांबर फणीवरबंधना | सरळ तोंड वक्रतुंड त्रिनयना | दास रामाचा वाट पाहे सदना | संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवरवंदना | जयदेव जयदेव जय मंगलमुर्ती | दर्शनमात्रे मन:कामना पुरती || ३ ||
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आरती संग्रह
श्री गणपतीची आरती
नाना परिमल दुर्वा शेंदूर शमीपत्रे | लाडू मोदक अन्ने परिपूरित पात्रे | ऐसे पूजन केल्या बीजाक्षरमंत्रे | अष्टही सिद्धी नवनिधी देसी क्षणमात्रे || १ || जयदेव जयदेव जय मंगलमुर्ती तुझे गुण वर्णाया मज कैची स्फूर्ती || जय || धृ || तुझे ध्यान निरंतर जे कोणी करिती | त्यांची सकलही पापे विघ्नेही हरती | वाजी वारण शिबिका सेवक सुत युवती | सर्वही पावुनी अंती भवसागर तरती || जयदेव || २ || शरणागत सर्वस्वे भजती तव चरणी | कीर्ती तयांची राहे जोवरी शशि – तरणी | त्रेलोक्यी ते विजयी अदभूत हे करणी | गोसावीनंदन रात नाम स्मरणी | जयदेव जय || ३ ||
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श्री गणपतीची आरती
शेंदूर लाल चढायो अच्छा गज मुखको | दोंदिल लाल विराजे सुत गौरीहरको | हाथ लिये गुडलड्डू साई सुरवरको | महिमा काहे न जाय लागत हुं पदको || १ || जय जय जी गणराज विद्यासुखदाता | धन्य तुम्हारा दर्शन मेरा मन रमता || धृ || अष्टौ सिद्धी दासी संकटको बैरी | विघ्नविनाशक मंगल मुरत अधिकारी | कोटीसुरजप्रकाश ऐसी छबी तेरी | गंडस्थलमदमस्तक झुले शशिबिहारी || जय || २ || भावभगतसे कोई शरणागत आवे | संतत संपत सबही भरपूर पावे | ऐसे तुम महाराज मोको अति भावे | गोसावीवंदन निशिदिन गुण गावे | जय जय जी गणराज विद्यासुखदाता || धन्य || ३ ||
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श्री शंकराची आरती
लवथवती विक्राळा ब्रम्हांडी माळा | वीषे कंठी कला त्रिनेत्री ज्वाळा | लावण्यसुंदर मस्तकी बाळा | तेथुनिया जल निर्मळ वाहे झुळझुळा || १ || जय देव जय देव जय श्रीशंकरा | आरती ओवाळू तुज कर्पूरगौरा || धृ || कर्पुरगौरा भोळा नयनी विशाळा | अर्धांगी पार्वती सुमनांच्या माळा | विभूतीचे उधळण शितिकंठ निळा | ऐसा शंकर शोभे उमावेल्हाळा | जय देव || २ || देवी दैत्यी सागर मंथन पै केले | त्यामाजी अवचित हळहळ जें उठिले | तें त्वां असुरपणे प्राशन केलें | नीळकंठ नाम प्रसिद्ध झाले | जय || ३ || व्याघ्रांबर फणिवरधर सुंदर मदनारी | पंचानन मनमोहन मुनिजनसुखकारी | शतकोटीचे बीज वाचे उच्चारी | रघुकुळटिळक रामदासाअंतरी || जय देव || ४ ||
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श्री देवीची आरती
दुर्गे दुर्घट भारी तुजवीण संसारी | अनाथनाथे अंबे करुणा विस्तारी | वारी वारी जन्ममरणाते वारी | हरी पडलो आता संकट निवारी || १ || जय देवी जय देवी महिषसूरमथिनी | सुरवरईश्वरवरदे तारक संजीवनी जय देवी जय देवी || धृ || त्रिभुवन भुवनी पाहता तुजऐसी नाही | चारी श्रमले परंतु न बोलवे काही | साही विवाद करिता पडिले प्रवाही | तें तू भक्तालागी पावसी लवलाही || जय || २ || प्रसन्नवदने प्रसन्न होसी निजदासा | क्लेशापासुनि सोडावि तोडी भवपाषा अंबे तुजवाचून कोण पुरविल आशा | नरहरी तल्लिन झाला पदपंकजलेशा | जय देवी जय देवी जय महिषासुरमथिनी | सुरवरईश्वरवरदे तारक || ३ ||
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श्री दत्ताची आरती
त्रिगुणात्मक त्रिमूर्ती दत्त हा जाणा | त्रिगुणी अवतार त्रिलोक्यराणा | नेति नेति शब्द नये अनुमाना | सुरवरमुनिजन योगी समाधी न ये ध्याना || १ || जय देव जय देव जय श्रीगुरुदत्ता | आरती ओवाळीता हरली भवचिंता जय देव जय देव || धृ || सबाह्य अभ्यंतरी तू एक दत्त | अभाग्यासी कैची कळेल हे मात | पराही परतली तेथे कैचा हा हेत | जन्ममरणाचा पुरलासे अंत || जय || २ || दत्त येउनिया उभा ठाकला भावे सांष्टागेसी प्रणिपात केला | प्रसन्न होऊनी आशीर्वाद दिधला | जन्ममरणाचा फेरा चुकविला || जय || ३ || दत्त दत्त ऐसे लागले ध्यान | हारपले मन झाले उन्मन | मी तू झाली बोळवण | एका जनार्दनी श्रीदत्तध्यान || जय देव || ४ ||
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श्री विठोबाची आरती
युगे अठ्ठावीस विटेवरी उभा | वामांगी रखुमाई दिसे दिव्य शोभा | पुंडलिकाचे भेटी परब्रम्ह आले गा | चरणी वाहे भीमा उद्धरी जगा || १ || जय देव जय देव जय पांडुरंगा || रखुमाईवल्लभा राहीच्या वल्लभा पावे जिवलगा जय देव जय देव || धृ || तुळसीमाळा गळा कर ठेवुनी कटी | कांसे पितांबर कस्तुरी लल्लाटी | देव सुरवर नित्य येती भेटी | गरुड हनुमंत पुढे उभे राहती || जय || २ || धन्य वेणुनाद अनुक्षेत्रपाळा | सुवर्णाची कमळे वनमाळा गळा | राई रखुमाई राणीया सकळा | ओवाळिती राजा विठोबा सावळा || जय || ३ || ओवाळू आरत्या कुर्वंड्या येती | चंद्रभागेमाजी सोडुनिया देती | दिंड्या पताका वैष्णव नाचती | पंढरीचा महिमा वर्णावा किती || जय || ४ || आषाढी कार्तिकी भक्तजन येती | चंद्रभागेमध्ये स्नाने जें करिती | दर्शनहेळामात्रे तया होय मुक्ती | केशवासी नामदेव भावे ओवाळिती || जय देव जय देव जय || ५ ||
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श्री विष्णूची आरती
आवडी गंगाजळे देवा न्हाणीले | भक्तीचे भूषण प्रेमासुगंध अर्पिले | अहं हा धूप जाळू श्रीहरीपुढे | जंव जंव धूप जळे | तंव तंव देवा आवडे | रमावल्लमदासे अहं धूप जाळिला | एकारतीचा मग प्रारंभ केला | सोहं हा दीप ओवाळू गोविंदा | समाधी लागली पाहतां मुखारविंदा | हरीख हरीख हातो मुख पाहतां | चाकाटल्या ह्या नारी सर्वही अवस्था | सदभवालागी बहु हा देव भुकेला | रमावल्लभदासे नैवेद्य अर्पिला | फल तांबूल दक्षिणा अर्पीली | तयाउपरी नीरांजने मांडिली || आरती आरती करू गोपाळा | मी तू पण सांडोनी वेळोवेळा || धृ || पंचप्राण पंचज्योती आरती उजळिली | दृश्य हे लोपलें तथा प्रकाशांतळी | आरतीप्रकाशे चंद्र सूर्य लोपलें | सुरवर सकळीक तटस्थ ठेले | देवभक्तपण न दिसे कांही | ऐशापरी दास रमावल्लभ पायीं || आरती ||
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नवरात्राची आरती
आश्विनशुध्दपक्षी अंबा बैसली सिंहासनी हो | प्रतिपदेपासून घटस्थापना ती करुनी हो | मूलमंत्रजप करुनी भोवते रक्षक ठेवुनी हो | ब्रम्हा विष्णू आईचे पूजन करिती हो || १ || उदो बोला उदो अंबाबाई माउलीचा हो | उदोकारे गर्जती काय महिमा वर्णू तिचा हो || धृ || द्वितीयेचे दिवशी मिळती चौसष्ट योगिनी हो | सकळामध्ये श्रेष्ठ परशुरामाची जननी हो | कस्तुरी मळवट भांगी शेंदूर भरुनी हो | उदोकारे गर्जती सकळ चामुंडा मिळूनी हो | उदो || तृतीयेचे दिवशी अंबे शृंगार मांडीला हो | मळवट पातळ चोळी कंठी हार मुक्ताफळा हो | कंठीची पदके कांसे पितांबर पिवळा हो | अष्टभुजा मिरविती अंबे सुंदर दिसे लीला हो | उदो || ३ || चतुर्थीचे दिवशी विश्वव्यापक जननी हो | उपासका पाहसी अंबे प्रसन्न अंत:करणी हो | पूर्ण कृपे तारिसी जगन्माते मनमोहिनी हो | भक्तांच्या माउली सुर तें येती लोटांगणी हो | उदो || ४ || पंचमीचे दिवशी व्रत तें उपांगललिता हो | अर्ध्यपाद्यपूजने तुजला भवानी स्तविती हो | रात्रीचे समयी करिती जागरण हरिकथा हो | आनंदे प्रेम तें आले सदभावे क्रीडता हो | उदो || ५ || षष्ठीचे दिवशी भक्तां आनंद वर्तला हो | घेउनी दिवट्या हस्ती हर्षे गोंधळ घातला हो | कवडी एक अर्पिता देसी हार मुक्ताफळा हो | जोगवा मांगता प्रसन्न झाली भक्तकुळा हो | उदो || ६ || सप्तमीचे दिवशी सप्तशृंगगडावरी हो | तेथे तू नांदसी भोवती पुष्पे नानापरी हो | जाईजुई शेवंती पूजा रेखियली बरवी हो | भक्त संकटी पडतां झेलुनी घेसी वरचेवरी हो | उदो || ७ || अष्टमीचे दिवशी अष्टभुजा नारायणी हो | सह्याद्रीपर्वती राहिली उभी जगज्जननी हो | मन माझे मोहिले शरण आलो तुजलागुनी हो | स्तनपान देऊनी सुखी केलें अंत:करणी हो | उदो || ८ || नवमीचे दिवशी नवदिवसाचे पारणे हो | सप्तशतीजप होमहवने सदभक्तीकरुनी हो | षड्रस अन्ने नैवेद्यासी अर्पियली भोजनी हो | आचार्य ब्राम्हणा तृप्त केलें कृपेकरुनी हो | उदो || ९ || दशमीच्या दिवशी अंबा निघे सीमोल्लघनी हो | सिंहारूढ करी दारूण शस्त्रे अंबे त्वां घेउनी हो | शुंभनिशुभादिक राक्षसा किती मारिसी रणी हो | विप्रा रामदासा आश्रम दिधला तो चरणी हो | उदो बोला उदो अंबाबाई माउलीचा हो || १० ||
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मारुतीची आरती
सत्राणे उड्डाणे हुंकार वदनी | करि डळमळ भूमंडळ सिंधूजळ गगनी || कडाडिले ब्रम्हांड धाक त्रिभुवनी | सुरवर नर निशाचर त्यां झाल्या पळणी || १ || जय देव जय देव जय श्रीहनुमंता | तुमचेनी प्रसादे न भी कृतांता || धृ || दुमदुमले पाताळ उठिला प्रतिशब्द | थरथरला धरणीधर मानिला खेद | कडकडिले पर्वत उद्दगण उच्छेद | रामी रामदासा शक्तीचा शोध || जय || २ ||
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श्री कृष्णाची आरती
ओवाळू आरती मदनगोपाळा | श्यामसुंदर गळा वैजयंतीमाळा || धृ || चरणकमल ज्याचे अति सुकुमार | ध्वजवज्रांकृश ब्रीदाचे तोडर ओवाळू || १ || नाभिकमल ज्याचे ब्रम्हयाचे स्थान | हृदयी पदक शोभे श्रीवत्सलांछन | ओवाळू || २ || मुखकमल पाहतां सुखाचिया कोटी | वेधले मानस हारपली दृष्टी | ओवाळू || ३ || जडित मुगुट ज्याचा देदिप्यमान | तेणे तेजे कोंदले अवघे त्रिभुवन | ओवाळू || ३ || एका जनार्दनी देखियले रूप | रूप पाहतां जाहले अवघे तद्रूप | ओवाळू || ५ ||
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श्री ज्ञानदेवाची आरती
आरती ज्ञानराजा | महाकैवल्यतेजा | सेविती साधुसंत || मनु वेधला माझा || आरती || धृ || लोपलें ज्ञान जगी | हित नेणती कोणी | अवतार पांडुरंग | नाम ठेविले ज्ञानी || १ || कनकाचे ताट करी | उभ्या गोपिका नारी | नारद तुंबर हो || साम गायन
    करी || २ || प्रकट गुह्य बोले | विश्र्व ब्रम्हाची केलें | रामजनार्दनी | पायी मस्तक ठेविले | आरती ज्ञानराजा | महाकैवल्यतेजा || सेविती || ३ ||
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श्री एकनाथाची आरती
आरती एकनाथा | महाराजा समर्था | त्रिभुवनी तूंचि थोर | जगदगुरू जगन्नाथा || धृ || एकनाथ नाम सार | वेदशास्त्रांचे गूज | संसारदु:ख नाम | महामंत्राचे बीज | आरती || १ || एकनाथ नाम घेतां | सुख वाटले चित्ता | अनंत गोपाळदासा | धणी न पुरे गातां | आरती एकनाथा | महाराजा समर्था || २ ||
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श्री तुकारामाची आरती 
आरती तुकारामा | स्वामी सदगुरूधामा | सच्चिदानंदमूर्ती | पाय दाखवी आम्हा || आरती || धृ || राघवे सागरांत | पाषाण तारिले | तैसे हे तुकोबाचे | अभंग उदकी रक्षिले || आरती || १ || तुकिता तुलनेसी | ब्रम्ह तुकासि आलें | म्हणुनी रामेश्वरे | चरणी मस्तक ठेविले || आरती तुकारामा || २ ||
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श्री रामदासाची आरती
आरती रामदासा | भक्त विरक्त ईशा | उगवला ज्ञानसूर्य || उजळोनी प्रकाशा || धृ || साक्षात शंकराचा | अवतार मारुती | कलिमाजी तेचि झाली | रामदासाची मूर्ती || १ || वीसही दशकांचा | दासबोध ग्रंथ केला | जडजीवां उद्धरिले नृप शिवासी तारीले || २ || ब्रम्हचर्य व्रत ज्याचे | रामरूप सृष्टी पाहे | कल्याण तिही लोकी | समर्थ सद्गुरुपाय || ३ || आरती रामदासा ||
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श्री पांडुरंगाची आरती
जय देव जय देव जय पांडुरंगा | आरती ओवाळू भावे जिवलगा || धृ || पंढरीक्षेत्रासी तू अवतरलासी | जगदुद्धारासाठी राया तू फिरसी | भक्तवत्सल खरा तू एक होसी | म्हणुनी शरण आलो तुझे चरणांसी || १ || त्रिगुण परब्रम्ह तुझा अवतार || त्याची काय वर्णू लीला पामर | शेषादिक शिणले त्यां न लागे पार | तेथे कैसा मूढ मी करू विस्तार || २ || देवाधिदेवा तू पंढरीराया | निर्जर मुनिजन घ्याती भावें तंव पायां | तुजसी अर्पण केली आपुली मी काया | शरणागता तारी तू देवराया || ३ || अघटीत लीला करुनी जड मूढ उद्धरिले | कीर्ती ऐकुनी क नी चरणी मी लोळे | चरणप्रसाद मोठा मज हे अनुभवले | तुझ्या भक्तां न लागे चरणांवेगळे | जय देव जय देव जय पांडुरंगा | आरती || ४ ||
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आरती जय जय जगदीश हरे
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे | भक्त जनो कें संकट क्षण में दूर करे || ओSम || जो घ्यावे फल पावे दु:ख विनशे मनका | सुख संपती घर आवे कष्ट मिटे तनका || ओSम || मात पिता तुम मेरे शरण गहू किसकी | तुम बिन और न दूजा आस करू किसकी || ओsम || तुम हो पुरण परमात्मा तुम अंतरयामी | पार ब्रम्ह परमेश्वर तुम सबके स्वामी || ओSम || तुम करुणा कें सागर तुम पालन कर्ता | मैं मुरख खल कामी कृपा करि भरता || ओSम || तुम हो एक अगोचर सबके प्राणपती | स्वामी किस विधी मिलू दयामय तुमको मैं कुमति || ॐ || दिन बंधू दुखहर्ता तुम रक्षक मेरे अपने हाथ उठाओ शरण पडा तेरे || ॐ || विषय विकार मिटाओ पापा हरे देवा | श्रद्धा भक्ति बधाओ संतन की देवा || ॐ ||
जय जय श्री शनिदेवाची आरती
जय जय श्रीशनिदेवा | पद्मकर शिरी ठेवा | आरती ओवाळिती | मनोभावे करुनी सेवा || धृ || सूर्यसुता शनीमूर्ती || तुझी अगाध कीर्ती | एक मुखे काय वर्णू | शेषा न चले स्फूर्ती || जय || नवग्रहांमाजी श्रेष्ठ | पराक्रम थोर तुझा | ज्यावरी कृपा करिसी | होय रंकाचा राजा || जय || २ || विक्रमासारीखा हो शककर्ता पुण्यराशी | गर्व धरितां शिक्षा केली | बहु छळियले त्यासी || जय || ३ || शंकराच्या वरदाने | गर्व रावणे केला | साडेसाती येतां त्यासी | समूळ नाशासी नेला || जय || ४ || प्रत्यक्ष गुरुनाथा | चमत्कार दावियेला | नेऊनि शूलापाशी | पुन्हा सन्मान केला || जय || ५ || ऐसे गुण किती गाऊ | धनी न पुरे गातां || कृपा करी दीनावरी | महाराजा समर्था || जय || ६ || दोन्ही कर जोडूनिया रखमां लीन सदा पायीं | प्रसाद हाची मागे | उदयकाळ सौख्य दावी | जय जय श्री शनिदेवा | पद्मकर शिरी ठेवा || ७ ||
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श्री संतोषीमातेची प्रासादिक आरती
जय देवी श्रीदेवी संतोषी माते | वंदन भावे माझे तंव पद कमलाते || धृ || श्रीलक्ष्मीदेवी तू श्रीविष्णुपत्नी || पावसी भक्तालागी अति सोप्या यत्नी || जननी विश्वाची तू जीवन चितशक्ती | शरण तुला मी आलो नुरवी आपत्ती || १ || भृगुवारी श्रद्धेने उपास तंव करिती | आंबट कोणी कांही अन्न न सेविती || गूळचण्याचा साधा प्रसाद भक्षिती | मंगल व्हावे म्हणुनी कथा श्रवण करिती || २ || जें कोणी नरनारी व्रत तंव आचरिती | अनन्य भावे तुजला स्मरूनी प्रार्थिती || त्यांच्या हाकेला तू धावूनिया येसी | संतति वैभव कीर्ती धनदौलत देसी || ३ || विश्र्वाधारे माते प्रसन्न तू व्हावे | भवभय हरुनी आम्हा सदैव रक्षावे || मनिची इच्छा व्हावी परिपूर्ण सगळी | म्हणुनी मिलिंदमाधव आरती ओवाळी || ४ ||
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आरती महालक्ष्मीची
जयदेवी जयदेवी जय लक्ष्मीमाता | प्रसन्न होऊनिया वर देई आता || धृ || विष्णुप्रिये तुझी सर्वांतरी सत्ता | धन दौलत देई लक्ष्मीव्रत करिता || १ | विश्वव्यापक जननी तुज ऐसी नाही | धावसी आम्हालागी पावसी लवलाही || २ || त्रैलोक्य धारिणी तू भक्ता लाभो  सुखशांती  | सर्व सर्वही दु:ख सर्व ती पळती || ३ || वैभव ऐश्वर्याचे तसेच द्रव्याचे | देसी दान वरदे सदैव सौख्याचे || ४ || यास्तव अगस्ती बंधू आरती ओवाळी | प्रेमे भक्तासवे लोटांगण घाली ||
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Datta Aarti – संत एकनाथ महाराजांनी रचलेली दत्ताची आरती आणि सोबत तीचा अर्थ आणि महत्व


Datta Aarti – संत एकनाथ महाराज रचित दत्त महाराजांची आरती

Datta AartiDatta Aarti  (दत्ताची आरती) संत एकनाथ महाराजांनी रचलेली असल्याने तिच्यामध्ये मुळातच चैतन्य ओतप्रोत भरलेले आहे. ‘सनातन’च्या भाव असलेल्या, म्हणजे ईश्वराच्या अस्तित्वाविषयी दृढ जाणीव असलेल्या साधकांनी ही आरती म्हटलेली असून तिच्यात वाद्यांचा न्यूनतम उपयोग केला असल्याने ती अधिक भावपूर्ण झाली आहे.

आरतीमधील शब्दांचा उच्चार कसा करायचा, शब्द म्हणण्याची गती कशी असावी, कोणते शब्द जोडून म्हणावेत किंवा वेगवेगळे म्हणावेत, हेही यातून कळेल.

||| Datta Aarti – दत्ताची आरती |||

त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ति दत्त हा जाणा ।
त्रिगुणी अवतार त्रैलोक्यराणा ।
नेति नेति शब्द न ये अनुमाना ।
सुरवर-मुनिजन-योगी-समाधि न ये ध्याना ।। १ ।।

 

जय देव जय देव जय श्री गुरुदत्ता ।
आरती ओवाळीता हरली भवचिंता ।। धृ० ।।
सबाह्य अभ्यंतरी तू एक दत्त ।
अभाग्यासी कैंची कळेल ही मात ।
पराही परतली तेथे कैंचा हेत ।
जन्ममरणाचा पुरलासे अंत ।। २ ।।

 

दत्त येऊनिया उभा ठाकला ।
सद्भावे साष्टांगे प्रणिपात केला ।
प्रसन्न होऊनी आशीर्वाद दिधला ।
जन्ममरणाचा फेरा चुकविला ।। ३ ।।

 

दत्त दत्त ऐसे लागले ध्यान ।
हारपले मन झाले उन्मन ।
मीतूपणाची झाली बोळवण ।
एका जनार्दनी श्री दत्तध्यान ।। ४ ।।

 

– संत एकनाथ 

 

आरतीमधील काही कठीण शब्दांचा भावार्थ
आता आपण श्री दत्ताची ‘त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ति …’ ही आरती ऐकली. या आरतीमधील काही कठीण शब्दांचा भावार्थ समजून घेऊया. अर्थ समजल्याने देवतेचे श्रेष्ठत्व समजण्यास आणि तिची भक्ती वाढण्यास साहाय्य होते.

 

१. ‘त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ति दत्त हा जाणा ।’ याचा अर्थ दत्त हा (कार्यानुरूप) त्रिगुणात्मक आहे, त्रैमूर्ती आहे. श्री दत्तात्रेयांचा जन्म ब्रह्मा, विष्णु आणि महेश यांच्या अंशापासून झालेला आहे. हे तीन देव उत्पत्ती, स्थिती आणि लय यांच्याशी संबंधित असल्यामुळे हे देव वस्तुतः त्रिगुणातीत असूनही कार्यानुसार गुणाश्रयी आहेत, म्हणजे अनुक्रमे रज, सत्त्व आणि तम या त्रिगुणांना ते आश्रय देतात.

 

२. ‘नेति नेति शब्द न ये अनुमाना ।’ याचा भावार्थ वेदांनी श्री दत्ताचे स्वरूप वर्णन करण्याचा प्रयत्न केला; परंतु त्यांना काहीच अनुमान न करता आल्याने ‘नेति, नेति’ म्हणजे ‘असे नाही, असे (ही) नाही’, एवढेच ते सांगू शकले.

 

३. ‘सबाह्य अभ्यंतरी तू एक दत्त ।’ म्हणजे आत-बाहेर पूर्णपणे तू एक दत्त केवळ गुरुतत्त्वरूप, ईश्वरतत्त्व असलेला आहेस.

 

४. ‘अभाग्यासी कैंची कळेल ही मात ।’ म्हणजे आम्हा अभागी, दुर्दैवी लोकांना तुझे माहात्म्य कसे कळणार ?

 

५. ‘पराही परतली तेथे कैंचा हेत ।’ म्हणजे श्री दत्ताचे वर्णन करायला गेलेली परावाणीही परत फिरली त्यात कोणता हेतू असावा बरे ? दत्ताचे स्वरूप तुर्यावस्थेच्या पलीकडे असल्याने परावाणीही तिथे पोहोचू शकत नाही. यामुळे ती काही न बोलताच परत फिरली.

 

६. ‘जन्ममरणाचा पुरलासे अंत ।’ याचा भावार्थ आहे, श्री दत्ताचे स्वरूप नित्य आणि अनादी-अनंत असे आहे. तिथे जन्ममरण हे शब्दच संपतात.

 

७. ‘जन्ममरणाचा फेरा चुकविला ।’ याचा भावार्थ जन्ममरणाच्या फेर्‍यातून माझी सुटका केली.
मला मोक्ष (टीप) दिला, असा आहे.

 

८. ‘मीतूपणाची झाली बोळवण ।’ याचा भावार्थ आहे, अद्वैतावस्था प्राप्त झाल्याने मी-तू हा आपपरभाव संपला आहे.

 

‘अशा पद्धतीने आपणासही भावपूर्ण आरती म्हणता येवो आणि भावजागृतीचा आनंद मिळो’, अशी श्री दत्ताच्या चरणी प्रार्थना आहे.

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|| श्री दुर्गा स्तोत्र || – Shri Durga Stotra


Shri Durga Stotra
|| श्री दुर्गा स्तोत्र || – Shri Durga Stotra
श्रीगणेशाय नमः । श्री दुर्गायै नमः ।
नगरांत प्रवेशले पंडुनंदन । तो देखिले दुर्गास्थान ।
धर्मराज करी स्तवन । जगदंबेचे तेधवा ॥ १ ॥
 जय जय दुर्गे भुवनेश्वरी । यशोदा गर्भ संभवकुमारी ।
इंदिरा रमण सहोदरी । नारायणी चंडिकेंऽबिके ॥ २ ॥
 जय जय जगदंबे विश्र्व कुटुंबिनी । मूलस्फूर्ति प्रणवरुपिणी ।
ब्रह्मानंदपददायिनी । चिद्विलासिनी अंबिके तू ॥ ३ ॥
 जय जय धराधर कुमारी । सौभाग्य गंगे त्रिपुर सुंदरी ।
हेरंब जननी अंतरी । प्रवेशीं तू आमुचे ॥ ४ ॥
 भक्तह्रदयारविंद भ्रमरी । तुझे कृपाबळे निर्धारी ।
अतिगूढ निगमार्थ विवरी । काव्यरचना करी अद्भुत ॥ ५ ॥
 तुझिये कृपावलोकनेंकरुन । गर्भांधासी येतील नयन ।
पांगुळा करील गमन । दूर पंथे जाऊनी ॥ ६ ॥
 जन्मादारभ्य जो मुका । होय वाचस्पतिसमान बोलका ।
तूं स्वानंदसरोवर मराळिका । होसी भाविकां सुप्रसन्न ॥ ७ ॥
 ब्रह्मानंदे आदिजननी । तव कृपेची नौका करुनि ।
दुस्तर भवसिंधु उल्लंघूनी । निवृत्ती तटां जाइजे ॥ ८ ॥
 जय जय आदिकुमारिके । जय जय मूलपीठनायीके ।
सकल सौभाग्य दायीके । जगदंबिके मूलप्रकृतिके ॥ ९ ॥
 जय जय भार्गवप्रिये भवानी । भयनाशके भक्तवरदायिनी ।
सुभद्रकारिके हिमनगनंदिनी । त्रिपुरसुंदरी महामाये ॥ १० ॥
 जय जय आनंदकासारमराळिके । पद्मनयने दुरितवनपावके ।
त्रिविधतापभवमोचके । सर्व व्यापके मृडानी ॥ ११ ॥
 शिवमानसकनकलतिके । जय चातुर्य चंपककलिके ।
शुंभनिशुंभदैत्यांतके । निजजनपालके अपर्णे ॥ १२ ॥
 तव मुखकमल शोभा देखोनी । इंदुबिंब गेले विरोनी ।
ब्रह्मादिदेव बाळें तान्ही । स्वानंदसदनी निजविसी ॥ १३ ॥
जीव शिव दोन्ही बाळकें । अंबे त्वां निर्मिली कौतुकें ।
स्वरुप तुझे जीव नोळखे । म्हणोनि पडला आवर्ती ॥ १४ ॥
 शिव तुझे स्मरणीं सावचित्त । म्हणोनि तो नित्यमुक्त ।
स्वानंदपद हातां येत । तुझे कृपेनें जननिये ॥ १५ ॥
 मेळवूनि पंचभूतांचा मेळ । त्वां रचिला ब्रह्मांडगोळ ।
इच्छा परततां तत्काळ । क्षणें निर्मूळे करिसी तूं ॥ १६ ॥
अनंत बालादित्यश्रेणी । तव प्रभेमाजी गेल्या लपोनि ।
सकल सौभाग्य शुभकल्याणी । रमारमणवरप्रदे ॥ १७ ॥
 जय शंबरि पुहर वल्लभे । त्रैलोक्य नगरारंभस्तंभे ।
आदिमाये आत्मप्रिये । सकलारंभे मूलप्रकृती ॥ १८ ॥
 जय करुणामृतसरिते । भक्तपालके गुणभरिते ।
अनंतब्रह्मांड फलांकिते । आदिमाये अन्नपूर्णे ॥ १९ ॥
तूं सच्चिदानंदप्रणवरुपिणी । सकल चराचर व्यापिनी ।
सर्गस्थित्यंत कारिणी । भवमोचिनी ब्रह्मानंदे ॥ २० ॥
 ऐकोनि धर्माचे स्तवन । दुर्गा जाहली प्रसन्न ।
म्हणे तुमचे शत्रू संहारीन । राज्यीं स्थापीन धर्माते ॥ २१ ॥
 तुम्ही वास करा येथ । प्रगटी नेदीं जनांत ।
शत्रू क्षय पावती समस्त । सुख अद्भुत तुम्हां होय ॥ २२ ॥
 त्वां जें स्तोत्र केलें पूर्ण । तें जे त्रिकाल करिती पठन ।
त्यांचे सर्व काम पुरवीन । सदा रक्षीन अंतर्बाह्य ॥ २३ ॥
 ॥ इति श्रीयुधिष्ठिरविरचितं श्रीदुर्गा स्तोत्रं संपूर्णम् ॥ – Shri Durga Stotra Completed

 

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॥ श्री व्यंकटेश स्तोत्रम् ॥ – Shri Venkatesh Stotra


Shri Venkatesh Stotra

Shri Venkatesh Stotra

श्रिया परिष्कृतोरस्कं दयामय शुभाकृतिम् ।
श्रीवेङ्कटशिखारत्नं श्रीनिवासं भजामहे ॥ १॥

सते वैकुण्ठखण्डेऽस्मिन्ननन्ताश्चर्यवैभवे ।
सुलभाय नमः पुंसे दुर्लभात्मसमाय नः ॥ २॥

अञ्जनाद्रिशिरस्यात्तव्यञ्जनायाञ्जनच्छिदे ।
अञ्जनाभाय शुद्धाय रञ्जनायात्मने नमः ॥ ३॥

अव्यक्ताय सुसूक्ष्माय स्वयंव्यक्ताय भास्वते ।
वृषभाद्रिविनोदाय विशुद्धज्योतिषे नमः ॥ ४॥

तस्मै परस्मै कस्मैचित्पुंसे संसेविताङ्घ्रये ।
सुरासुरनरैर्मुक्तैरिव नित्यश्रिये नमः ॥ ५॥

अद्रीकृतमहातल्पमविकल्पदयानिधिम् ।
आश्रितप्रार्थनाकल्पमाकल्पयतु मे मनः ॥ ६॥

अखर्वपूर्वदेवादिगर्वसर्वङ्कषौजसे ।
नमः श्रीशाय शर्वादिसुपर्वस्तुतपर्वणे ॥ ७॥

उत्तुङ्गाचलशृङ्गस्थो दयारङ्गैरपाङ्गितैः ।
समानपि समान्पश्यन् जन्तून् मन्तून्क्षिपेत्स नः ॥ ८॥

आकृष्य भविनो व्याजैः आधिव्याध्येकभेषजम् ।
अनुभावयते रूपं निधये श्रीश्रियै नमः ॥ ९॥

नित्यश्रीवासनिर्दुष्टहृदयाय दयात्मने ।
निखिलानुग्रहैकार्थविग्रहाय नमोऽस्तु नः ॥ १०॥

अर्चिताय नमो दिव्यैस्सुमनोभिस्सुगन्धये ।
विबुधामृतदायास्तु वृषभाद्रिविशोभिने ॥ ११॥

घनपत्रलसिम्हाद्रिवनच्छायेन वर्प्भणा ।
घनाघनसमानेन जनतापच्छिदे नमः ॥ १२॥

नानाशाखोपपन्नाय सुपर्णोद्भासितात्मने ।
निश्शेषफलदायास्तु नमः कल्पद्रुमाय नः ॥ १३॥

यामुनाध्वगतोद्बोधसुमनस्संस्तुतात्मने ।
नित्यगोपजनेष्टाय गोविन्दाय नमोऽस्तु नः ॥ १४॥

बालोपच्छन्दनन्यायकृतविश्वहितं परम् ।
अवतीर्णं प्रभुं तीर्णक्लेशं कारणमाश्रये ॥ १५॥

कप्यासकञ्जनेत्राय नमः कल्मषहारिणे ।
मनःप्रग्रहरूद्वाक्षवशीकार्याय विष्णवे ॥ १६॥
प्रशस्तनागपृष्टेऽस्मिन्नाकपृष्ठ इव स्थितम् ।
नित्यसूर्याश्रयं धाम जगत्सवितृ तन्नुमः ॥ १७॥

अपारविभवानेकतीर्थे दिव्ये वृषाचले ।
मध्यलोकमहारत्ने वसते विष्णवे नमः ॥ १८॥

आनन्दनिलयख्यातविमानान्तर्विभूषणम् ।
अशेषेश्वरमानन्दमयं ब्रह्म परं स्तुमः ॥ १९॥

सेवे तौ दम्पती दिव्यौ यावेनांसि भवार्दितान् ।
हरावः प्रणिपात्येति वराहक्षेत्रमाश्रितौ ॥ २०॥

प्रणिपात्यानुगृह्यापि पद्मया प्रेषितान् जनान् ।
प्रपाद्य परमानन्दे मज्जयित्रे नमो नमः ॥ २१॥

सप्तपर्वतसोपानसमारोहश्रमैर्भवान् ।
अघानि फलयन् श्रीश स्वात्मसात्कुरुते श्रितान् ॥ २२॥

आरुह्य पर्वतानुच्चैः अधःस्थान् वीक्ष्य साधवः ।
भक्ताभक्तान्तरं श्रीमन्नेतावदिति मन्वते ॥ २३॥

यं त्वां मुक्तामयाकल्पं सदा मुक्तामयाः श्रिताः ।
मुक्ता मयापि पाप्मानः येन श्रीनाथ ते नमः ॥ २४॥

अदृष्टश्रीनिवासानामश्रिताहीन्द्रभूभृताम् ।
परो दूरेऽस्ति वैकुण्ठः इति धीरस्त्यपवित्रमा ॥ २५॥

अमृतस्यन्दिभिर्मुक्तैर्नित्यमुक्तैस्सभक्तिकम् ।
सुमैस्सुवर्णैस्त्वं नित्यमुक्तैश्च श्रीनिधेऽर्च्यसे ॥ २६॥

चित्रभूरमृतं तेजः प्राणः खं ब्रह्म माधव ।
मूलं फलं रसो वै स सुखं तत् सर्वमप्यसि ॥ २७॥

घनाघनप्रभं शेषधराधरशिरःस्थितम् ।
रमारमणमाहुस्त्वां परापरविदो गतिम् ॥ २८॥

वन्दे वैकुण्ठशैलेशं वैकुण्ठं कुण्ठितांहसम् ।
एककण्ठ्यं प्रमाणानां यत्र, यस्यापि च श्रिया ॥ २९॥

निहत्यान्तस्तमो लोकानवते नवतेजसे ।
सर्वगन्धरसाय स्याद्विचित्र श्रीश ते नमः ॥ ३०॥

अस्तदोषं समस्ताढ्यं शस्तं कस्तं स्तवैस्स्तुवन् ।
पारं द्रक्ष्यत्यतो नैष परीहासाय मे श्रमः ॥ ३१॥
श्रीवेङ्कटेशाय नमः ।
ज्ञानशीलनिधिं नौमि मुनिं श्रीरङ्गलक्षणम् ।
गुरुं, गुरोर्मुखाद्यस्य श्रीवासो भरमग्रहीत् ॥ ३२॥

प्रपद्ये पञ्चसंस्कारगुरुं त्रव्यन्तलक्ष्मणम् ।
नित्यश्रीवासनिध्यानपूर्णेज्यं प्राज्ञयोगिनम् ॥ ३३॥

नानाकृतिकृतक्षेमं नारायणगिरिस्थितम् ।
प्रपत्तिदर्शनं वन्दे देशिकं वेङ्कटेश्वरम् ॥ ३४॥

श्रुतिचक्षुर्बलद्योऽसौ श्रीनिधिं देवतोत्तमम् ।
स्थापयामास योगीन्द्रश्शेष एतं श्रयेऽनिशम् ॥ ३५॥

बद्धाञ्जलिपुटो नित्यं प्रपद्ये सप्त पर्वतान् ।
श्रिया विहरते सार्धं येषु नः पुरुषोत्तमः ॥ ३६॥

अहीन्द्रशैलवास्तव्यमद्भुतं धाम तन्मयि ।
अपाङ्गरिङ्गणं किञ्चिदातनोत्वनुकम्पया ॥ ३७॥

आनन्दात्म यदाश्रित्य सुखमिन्धे जगत्त्रयम् ।
शेषशैलशिरोरत्नं प्रत्नं तद्दयतां मयि ॥ ३८॥

महिमाऽनन्यसामान्यो मान्यं सौलभ्यमीश्वरे
श्रूयतेऽस्तीति यत्तस्य देव एष निदर्शनम् ॥ ३९॥

कटाक्षाय नमस्तस्मै वेङ्कटब्रह्मणो विभो ।
अनुकम्पामुपाश्लिष्य जाग्रद्यः कुरुते जगत् ॥ ४०॥

निःश्रेयसस्थलमिवैष फणिन्द्रशैलो ।
नाथ त्वया भवति मङ्गलविग्रहेण
तन्मादृशाननुगृहाण तथा यथा त्वाम् ।
आराधयेयुरपि तामनपेक्ष्य मुक्तिम् ॥ ४१॥

नूनं वसन्नपि भवानमृते विभूतौ
आत्मप्रभाभिरतसीसुममेचकाभिः ।
व्याप्नोति वेङ्कटविभो भुवनान्यथापि
भाग्याय नस्तव तु मङ्गलविग्रहोऽयम् ॥ ४२॥

पित्रोरनुग्रहपदं न परं सुपुत्राः
दुष्टास्सुता अपि तदस्तु रमानिवास ।
बाढं तु विश्वसिमि हानपदं न चाहं
क्केवोपयोक्ष्यत इयं करुणा विना माम् ॥ ४३॥

याचे भवन्तमिह काङ्क्षितमर्पयेति
नो चेद्विभो क्क तव गच्छतु शेष एषः ।
त्रायस्व वा वृषगिरीश दयाप्रभावात्
आहो त्यज ध्रुवमिदं शरणं त्वमेव ॥ ४४॥

द्विदशशतरसज्ञो नायमीष्टेऽपराधान्
मम गणयितुमेषा निष्कृतिस्सा क्क कोणे ।
अतिविमलधियो यां यां मुनीन्द्रास्स्मरन्ति
त्वयि शमयतु तत्तान् साञ्जलिर्मे प्रणामः ॥ ४५॥

सकृदपि यदि शेषश्शेषशैलेश्वर त्वां
नमति निहितबुद्धिः तत्प्रभृत्येष धन्यः ।
मम तु किमिह कुर्यां चञ्चलं मानसं यत्
क्षणमपि न पुनस्त्वद्व्युग्रतामेति कृच्छात् ॥ ४६॥

त्वयि विनिहितबुद्धिर्नाथ जात्वेष भूयात्
भवतु मयि दया ते मा प्रतीक्षस्व किञ्चित् ।
तृणमपि न चलेत्त्वामन्तरेणेति सत्ये
मम कथमिह यत्नस्सिध्यतु त्वां विनैव ॥ ४७॥

अनुदिनमतिभाग्यादाश्रयन्ते भवन्तं
य इह विमलचित्ताः द्विष्टसंसारदुःखाः ।
न न भवति तदा नः तैस्सह त्वत्स्तवेच्छा
वृषगिरिभुवि विष्णो मां यदि त्वं दयेथाः ॥ ४८॥

पुनन्तु पादाम्बुजयुग्मरेणवः
फणीन्द्रशैलेश्वर ते प्रतिक्षणम् ।
स्मरन् ध्रुवं यान् समयेषु सादरं
प्रगल्भते प्रार्थितलम्भने जनः ॥ ४९॥

वृषाद्रिशृङ्गे विभवं श्रियःपते
विभाव्य ते विस्मरतात् कथं जनः ।
मुहुर्मुहुर्यः क्रमशोऽनुसंहितो
विधास्यति त्वय्यतुलां दृढां मतिम् ॥ ५०॥

श्रियःपते वैभवमेव ते महत्
यदाश्रितस्सप्त गिरीनहो जनः ।
अखिन्नपादस्सुखमेव लङ्घयन्
सिसेविषुस्त्वामभिवन्द्य मोदते ॥ ५१॥

जगन्नियन्ता न भवेद्भवेद्वा
नास्ते यतो जातु न दृश्यतेऽपि
यद्यस्ति दृश्येत तदेति पक्षः
त्वया वृषाद्रीश विलीयते स्म ॥ ५२॥

आम्नायबाह्ये जगति प्रभूते
न कश्चन त्वां ध्रुवमभ्युपैष्यत् ।
नचेद्भवान् शेषमहीध्रभूमौ
अद्योतयिष्यत्स्वमनन्यवेद्यः ॥ ५३॥

मन्ये य एतादृशमीश्वरं त्वां
प्रवर्तते हन्त जनो निरोद्धुम् ।
कलेस्स कोऽपि प्रभवः प्रमूढः
कथञ्च केनापि न शिक्षणीयः ॥ ५४॥

भोक्तव्यं कृतमिति निश्चिता मतिर्मे
खेदस्तु प्रतिदिनमप्यसह्य एषः ।
याचेऽहं वृषगिरिनाथ दीनदीनः
पापानि प्रशमय मे कटाक्षितैस्ते ॥ ५५॥

धन्यास्ते फणधरभूधरे तु वृक्षाः
धन्यास्ते प्रतिदिवसं तु किङ्करास्ते ।
धन्यास्ते विमलधियः स्तुवन्ति ये त्वां
धन्यस्स्यामहमिह ते कटाक्षितेन ॥ ५६॥

ब्रह्माद्याः प्रणिहितमानसास्सुरास्ते
सन्तीति श्रितदय मा भवानुदास्ताम् ।
सत्यं यत्तव न सुदुर्लभाः स्तवास्ते
दिष्ठ्या तु क्षणमिह दत्तदृष्टिरस्मि ॥ ५७॥

इष्टं यद्भवति तदाप्तये जगत्यां
सुस्पष्टं वदति जनो ह्युपायभेदान्
सन्त्वेते, यदि न भवान् दयेत किं स्यात्
त्तद्याचे द्रुतमिह मे फलं प्रयच्छ ॥ ५८॥

यस्यादरेण भवतो ननु वेङ्कटाख्यः
पापापनोदनविधौ पटुरेष शैलः
यस्यानुभावमनुमाय महर्षयस्ते
वाञ्छन्ति तत्र तृणतां तमहं भजामि ॥ ५९॥

श्रीश त्वया किमिति वाऽऽद्रियते वृषाद्रिः
तस्याथवा फलमिदं तपसस्तु कस्य ।
ज्ञानेन वा किमथ तस्य वृषाद्रिनाथ
चित्ते तु मे वस न किञ्चन कर्तुमीशे ॥ ६०॥

लज्जे न कर्तुमिह किञ्चन यन्निषिद्धम्
बद्धाञ्जलेस्त्वयि नतिस्तु न बुद्धिपूर्वा ।
भव्यं तथापि भवितेति वृषाद्रिनाथ
मन्ये दयार्द्रभवदीयकटाक्षलाभात् ॥ ६१॥

कदाचिदासाद्य वृषाद्रिशृङ्गं
विलोक्य ते वैभवमाश्रितस्त्वाम् ।
सत्यं हरे वेङ्कटशैलनाथ
विहातुमिच्छेन्न कदापि तु त्वाम् ॥ ६२२॥

अहमहमिकया सिसेविषूणां
यदि निचयं प्रतिवासरं जनानाम् ।
वृषगिरिशिखरे विलोक्य ऋध्नो-
त्यथ किमु ते पदसेविनां विचारः ॥ ६३॥

विसृत्वरो यस्य कटाक्ष एष
विनम्रमिष्टैरभिषिञ्चति द्राक् ।
भजे तमेतं वृषशैलदेवं
श्रियःपतिं शेखरमागमानाम् ॥ ६४॥

निरत्ययं खेलतु भावना मे
यथा च ते मङ्गलविग्रहेऽस्मिन् ।
तथा दयेथाः वृषशैलनाथ
यथा च नान्यत्र गतिर्ममास्तु ॥ ६५॥

यस्यानुभावं स्वयमैकमत्यात्
उच्चैर्वदन्ति श्रुतयो विभिन्नाः ।
अहीन्द्रशैलस्य शिरोमणिं तम्
आश्रित्य नारायणमस्मि तुष्टः ॥ ६६॥

हृदयेषु सतां वृषाद्रिशृङ्गे
निगमान्तेषु च नित्यमुल्लसन्तम् ।
कमपि श्रितवत्सलञ्च लक्ष्मी-
पदलाक्षाङ्कितवक्षसं स्मरामि ॥ ६७॥

अस्माकमार्तिशमनाय वृषाचलेऽस्मिन्
अध्यक्षितः कलशवारिधिकन्यकेशः ।
कारुण्यसारकलितेन कटाक्षितेन
श्रेयस्तनोतु शरणम् जगतां त्रयाणाम् ॥ ६८॥

निरीक्षमाणः कृपयाऽर्थिनं जनं
परीक्षमाणश्च वृषाचलेश तम् ।
यथा न खेदोऽस्य भवेत्तथा भवान्
हितं वितन्नन्नखिलञ्च रक्षति ॥ ६९॥

रमामुखाम्बुजोल्लासवीक्षणस्मेरचक्षुषः
प्रसीदन्तु कटाक्षास्ते वृषशैलेशितुर्मयि ॥ ७०॥

अर्थादौ प्रौढिमाभावेप्यपरित्याज्यतां विदन्
श्रीनिवासस्तुतिं वेगाद्व्यतानीद्वीरराघवः ॥ ७१॥

श्रीनिवासाय नमः
सम्यग्विभाव्य सकलं पुनरैहिकाद्यं
मायावशेन भवता कमलेश सृष्टम् ।
सर्वात्मकं सुखमयञ्च भवन्तमीहे
दृष्ट्वा गुरोश्च भवति स्वयमैकतान्यम् ॥ ७२॥

अत्यन्तसुन्दरमुखाम्बुजमन्दहासात्
नेत्रोत्पलप्रहितनिस्तुलवीक्षितैश्च ।
क्षेमं दधत्सकललोकनिदानमेष
शेषाद्रिशेखरमणिश्शरणं ममास्तु ॥ ७३॥

कलशपयोधिजाकमलसोदरनेत्रयुग-
प्रहितकटाक्षवर्षकृतनीलिममूर्तिरसौ ।
निगमशिरोभिराकलितनैजगुणांशकलः
कलयतु मङ्गलं सततमेष वृषाद्रिपतिः ॥ ७४॥

पद्मयाऽलङ्कृतोरस्स्थलं प्रार्थये
पूरुषञ्चोत्तमं शेषशैलेश्चरम् ।
दुःखमागन्तु मे दूरतः प्रक्षिपत्
भूरिकल्याणकृद्वीक्षितं प्रेष्यताम् ॥ ७५॥

सुरमौलिमकुटमण्डनमन्दारस्रङ्मरन्दमेदुरितम् ।
संवाहितं श्रिया नः श्रियं समेधयतु शौरिपदपद्मम् ॥ ७६॥

कलशाम्बुराशिकन्याकौस्तुभवनमालिकादिकलितं तत्
वक्षस्स्थलं विधत्तां वेङ्कटनाथस्य मङ्गलानि मम ॥ ७७॥

दिवि तिष्ठति वृक्ष इव स्तब्ध इति त्वां धरेऽत्र तिष्ठन्तम् ।
सकलफलकल्पवृक्षं पुरुषं श्रीमन् श्रुतिस्स्तौति ॥ ७८॥

कलयामि सन्ततमिमं कमपि कृपावारिशेवधिं देवम् ।
विनतजनजातरक्षादीक्षं श्रीभूमिवल्लभं शरणम् ॥ ७९॥

वेङ्कटभूधरशिखरद्योति परं किमपि धाम निर्हेतु ।
निखिलजगदेकहेतुर्नैसर्गिकगुणगभीरमस्तु हृदि ॥ ८०॥

आश्रितरक्षणसूचकहस्ताम्बुजमुद्रमखिलदेवमिमम् ।
शेषमहीधरभूषणमेष जनः श्रीनिधिं नमति ॥ ८१॥

अनिदम्प्रथमानि वचांस्यशेषतो बोधयन्ति यं देवम् ।
विनतातनयमहीधरशिखरपरिष्कारमाश्रये श्रीशम् ॥ ८२॥

सर्वत्र जगति तिष्ठन् सर्वस्याप्यश्रयः श्रियःकान्तः ।
नारायणशिखरिशिरःपरिष्कृतिश्शरणमस्तु देवो नः ॥ ८३॥

विद्युदुदञ्चितदीप्तिस्तरुणो धाराधरो यथा देवः ।
अञ्जनगिरिमधितिष्ठन्नञ्जनमखिलं व्यपोहतु श्रीशः ॥ ८४॥

जगतस्सुखमेधयते मेधां भक्तिञ्च सम्पदं ददते ।
वृषपर्वतशिखरजुषे श्रीमण्डितवक्षसे नमम्सततम् ॥ ८५॥

प्रह्लादमन्वगृह्णात्कृपानिधिः श्रीनृसिंहमूर्तिर्यः ।
सिंहाचलशिखरगतो देवः श्रीवल्लभस्स एष गतिः ॥ ८६॥

सप्ताचलाधिनाथो द्विसप्तलोकाधिराज एष हरिः ।
सङ्ख्यातीतै रूपैस्समुल्लसन् श्रीपतिः परं शरणम् ॥ ८७॥

सप्तशैलस्वामिने नमः ।
॥ श्रीमते हयवदनपरभ्रह्मणे नमः ॥

॥ वर्णमालास्तवः ॥

अस्तु वस्त्विदमनन्तभूधरे निस्तुलद्युति समस्तदैवतम् ।
शस्तदं श्रितवतामुरस्तलन्यस्तमानितरमं परं हृदि ॥ ८८॥

आदरेण वृषभूधरेशितुर्मेदुरेण भयधैर्यनिश्चयैः ।
पङ्कजातसदृशे पदे नतिः पङ्कजातशमनीयमस्तु नः ॥ ८९॥

इज्ययाऽहमहिराजभूभृतः प्राज्यया परिबृढं प्रहर्षयन् ।
नित्यमस्य पदपद्मचिन्तया कृत्यकृद्भवितुमस्मि कामनः ॥ ९०॥

ईडितुं श्रुतिगणैस्सदोद्यतैः व्रीडितं हि यमनन्तभूमकम् ।
तस्य शेषगिरिशृङ्गवासिनः न्यस्य पद्यधिमुदस्मि मे भरम् ॥ ९१॥

उच्चनीचपदभेदचिन्तनां व्युच्चरन्त्यविकलं विना यतः ।
पद्मवासरसिकापतेर्दयासद्मनो दृश इमं श्रयेऽनिशम् ॥ ९२॥

ऊर्जितं किमपि धाम संश्रये वर्जितं स्वयमशेषहेयतः ।
शेषशैलशिखराग्र्यभूषणं शेषभूतनिखिलं श्रियःपतिम् ॥ ९३॥

ऋद्धिरत्र च परत्र चार्थ्यते सिद्धिरात्मशुभकर्मणो यतः ।
व्यक्तिमेत्य वृषपर्वते स्थितं सक्तिमेति तमवेक्षितुं मनः ॥ ९४॥

नॄनसावनुजिघृक्षुरादरादेनसा दिवमुपैतुमक्षमान् ।
अञ्जनाचलशिरः श्रितो रमारञ्जनो य इममाश्रयेमहि ॥ ९५॥

क्लप्तचेतसमदुष्टरक्षणे दृप्तदुष्टदमने च माधवम् ।
अंहसां निधिरयं जनो हरिं रंहसा शरणमेति विश्वसन् ॥ ९६॥

एति यो गिरिमुपैति ते पदं हेतिभूषणलसद्विभूतिक ।
स श्रयत्यभिमतानि सत्पदान्यश्रमेण भुवनेष्वपि त्रिषु ॥ ९७॥

ऐन्द्रमुख्यपदचिन्तनं वृथा चन्द्रकोटिजयिनो वृषेश्वर ।
व्याकृतानवधिनामरूप ते ह्याकृतेः पदमिदं परं पदम् ॥ ९८॥

ओजसैष विदधद्भुवं वशे भो जनाः नस्यति शेषभूभृति ।
विप्रतीपविधिभिः किमस्ति वः क्षिप्रमेष शरणं चिकीर्ष्यताम् ॥ ९९॥

औदरैकनिरतान् धनार्थिनोप्यादरेण हरिरेप मुक्तिदः ।
पश्यतीह वृपवल्लभो जनाः नश्यथ स्वयमुपेत्य किं परान् ॥ १००॥

अम्बुजाक्ष इह शेषभूधरे कम्बुचक्रलसदंसकुण्डलः ।
प्रत्ननव्यबहुभव्यभूषणो रत्नराशिरिव राजति स्थिरः ॥ १०१॥

अः परो यदिह तत्परः स्थितः, कः परश्शुभकरश्श्रयेम तम् ।
शेषवासरसिकेऽत्र शेषिता शेषतापि यदशेषतस्स्थिरा ॥ १०२॥

कमलदळविमलशीतळकर्णान्तविशाललोचनोदारम् ।
कमपि कमलासनाथं कलये वृषशैलविहरणं कृष्णम् ॥ १०३॥

खरशठकठोरहृदयस्वभावभेदिप्रभावभूमानम् ।
खरकिरणकोटिभास्वरमखरकराह्लादमच्युतं वन्दे ॥ १०४॥

गतिमन्येष्वात्मनि वा फलार्थिनामप्यनर्थिनाञ्च परम् ।
सर्वान्तरं समेतं समया रमया दयानिधिं नौमि ॥ १०५॥

घनसुकृतजनसमर्चित घनाघनप्रार्थ्यदिव्यभव्याभ ।
अघनोदन जीवघनात् परं श्रियस्त्वां पतिं समीक्षेय ॥ १०६॥

ङ्सङ्सिनित्यविचारो द्रव्यगुणस्पन्दसततघोषश्च ।
व्यर्थो वृषशैलपतेस्सन्तश्चिन्तयत सन्ततं रूपम् ॥ १०७॥

चरणं वृषशैलमणेस्तरणं जगतस्समाश्रये शरणम् ।
अरुणाम्बुजदळसुन्दर करुणारसनिर्भरायताक्ष तव ॥ १०८॥

छविभिस्सकलं तेजश्छादयते यस्स्वयम्प्रभः प्रभवः ।
तमहं तरुणपयोधरवर्णं वृषशैलविहरणं प्रणतः ॥ १०९॥

जगदवन-हरण-भवनाद्याश्चर्यक्रीडमञ्जनापीडम् ।
रमया सनाथममलं हृदये मे प्रार्थये स्थितये ॥ ११०॥

झटिति त्यजति भवन्तं सन्ततमभ्यस्तलोलुपं चित्तम् ।
वृषशैलशिखरविहरण विवरीतुं त्वां कदा नु ते कामः ॥ १११॥

ञाव् ञाविति कलहपरो भक्षे मार्जार इव जनो यत्र ।
परहानि-स्वात्मसुखप्रवणस्तस्माद्रमेश रक्ष भवात् ॥ ११२॥

टीकाश्शतं विधत्तां व्याचष्टां शृतिषु काममर्थशतम् ।
किं तेन यदि विरज्य न भृङ्क्तेन ध्यायतीह विष्णो त्वाम् ॥ ११३॥

ठक्किति यावत्प्राणाः न तनोर्निर्यान्ति तावदस्त्वेषः ।
परिपोषितभक्तिरसो भुवि भवति ध्यानपूजनैश्श्रीश ॥ ११४॥

डयत इति विहगमात्रं न कथञ्चन ते रथो यथा विष्णो ।
अहमपि तथा न विधिरिव तथापि नाथ स्तुतिप्रियेक्षस्व ॥ ११५॥

ढक्कादिवादनोल्बणनाट्यरसेन स्तवेन भव्येन ।
अनुभूय राधयति यं शम्भुस्तं सिंहशैलगं स्तौमि ॥ ११६॥

ण इति हि वर्णो वार्णासिद्धेर्विष्णोश्च वर्णने हेतुः ।
नारायणसंज्ञां त्वयि नियमयति श्रीवृषाद्रीश ॥ ११७॥

तटिदुज्ज्वलो घनो यो वनमालाशोभनो वृषाधीनः
तद्दृष्टौ न भवेयुः केकाः कथमत्र पक्षिणां मध्ये ॥ ११८॥

स्थिरकृष्ण पक्षरम्या हंसाः प्राप्ता अहं स इति यागम् ।
स्वपरभिदैकपरा इह चित्रं शुद्धाश्चरन्ति वृषे ॥ ११९॥

दक्षास्सन्ति गिरीशास्तदैव ते सर्वमङ्गलाकाराः ।
सद्गणपतयस्सुगुहाश्शेषगिरीशान भक्तौघाः ॥ १२०॥

धावन्ति च धोरन्ति च धयन्ति च त्वां स्तवैश्च धिन्वन्ति ।
लब्धञ्च धारयन्ति श्रीशेत्थं पञ्चधा भक्ताः ॥ १२१॥

नागेन्द्रनगवरं यो न गतो नगतो नरस्य नास्य भिदा ।
फलदं नगस्य जन्म स्यादस्य तु निष्फलं जन्म ॥ १२२॥

पाणिपयोजगतस्ते शङ्खो हंसस्सुदर्शनश्लिष्टः ।
श्रीमन् पदपद्मगतैर्हंसैर्दृष्टोऽथ मानसे लसति ॥ १२३॥

फलमिदमेवेति सतां फलदं त्वरयेति संसृतिं वहताम् ।
यत्र परा प्रतिपत्तिः तत् त्वद्रूपं वृषाद्रीश ॥ १२४॥

बेरैः पञ्चभिरेतैस्सव्यूहः पर इव त्वमुल्लससि ।
वृक्ष इवैकस्स्तब्धो दिवि तिष्ठ्न् शेषशैलशिखरे त्वम् ॥ १२५॥

भवतु भगवन्मुकुन्द श्रीवल्लभ वेङ्कटाद्रिशृङ्गमणे ।
कुलदैव कल्पवृक्षन्त्येवं त्वयि मे वचोऽजस्रम् ॥ १२६॥

मदनकदनैर्धंनायावेताल्या पारलौकिकैर्धर्मैः ।
भृशमत्र कर्शितानां परायणं त्वं रसायनं भगवन् ॥ १२७॥

यस्याः कणास्सरन्तो भाग्यवशात्संहतास्सुखाय भुवः ।
विलसन्ति तत्रतत्र श्रीमन् वात्सल्यदीर्धिका सा त्वम् ॥ १२८॥

रमयितुमेव रमां त्वं भूमिमविन्दः प्रजाश्च पासीति ।
गमयति घोषो नाम्नोः कथां रमारमण गोविन्द ॥ १२९॥

लक्ष्मीं शुकपुरि तपसा प्राप्य श्रीशैलशृङ्गशृङ्गारः ।
तपसो विदूरभविनस्तपस्विनो वीक्षसे दयया ॥ १३०॥

वन्दारुनन्दथुवहं बृन्दावनचारि वारिजाऽऽताम्रम् ।
शुभशेषभोगवासं श्रीवास त्वत्पदं विभातु हृदि ॥ १३१॥

शक्तो दिवि स्थितस्त्वं सर्वत्र तथापि शेषमायातः ।
असमर्थबद्धभक्तव्रातसमाश्लेषविरहसन्तप्तः ॥ १३२॥

षड्गुणमन्नं दिव्यं त्रिगुणरतान् सादरं समास्वाद्य ।
अक्लेशतो विरक्तिं वर्धयसे वृषगिरीश त्वम् ॥ १३३॥

सद्यः फलं प्रयच्छति कल्पतरौ सत्पशैलशिखरस्थे ।
अनुकल्पभूतमल्पदमन्यद्दैन्येन किं सेव्यम् ॥ १३४॥

हयवदनाद्यवतारैराब्रह्ममनुष्यमान्ध्यहर्तारम् ।
वेदगिरिशिखरशेखरमिमं नुमो भक्तिधीवृद्व्यै ॥ १३५॥

॥ इति वर्णमालस्तवः ॥

कुण्डलिराजगिरिस्थः खण्डितसकलान्तराय एष हरिः ।
कल्याणं कलयतु नः कलशाकूपारकन्यकानिलयः ॥ १३६॥

वृषगिरिशिखरविहारी वृषमुखविबुधाभिवन्द्यपदपद्मः ।
वृषमस्मासु विधत्तां वीक्षावलितैर्विशिष्टकारुण्यैः ॥ १३७॥

पुष्णासि भोगमखिलं क्लिश्नाति न किञ्चिदाश्रित इह त्वाम् ।
तमिमं मुकुन्द वन्दे देवं त्वां वृषगिरीशानम् ॥ १३८॥

अञ्जनाचलविभूषणं भजे कञ्जलोचनमशेषदैवतम् ।
आदरेण निगमान्तदेशिको यो बभूव जगदुद्दिधीर्षया ॥ १३९॥

श्रीनिधानमनपायि वत्सलं तन्निधानमधिशेषभूधरम् ।
सावधानमनुभोक्तुमादरात्संविधानपरमस्तु मे मनः ॥ १४०॥

आश्रये श्रितजनावने स्थितं धाम दिव्यमनघं दयानिधिम् ।
वेङ्कटाचलविहारि वारिदश्यामसुन्दरमघापनुत्तये ॥ १४१॥

कामये कमलकोमलं तव क्षान्तिसागर पदं परायणम् ।
काम एष मम कापथे बत प्रस्थितिं न पुनरेतु किञ्चन ॥ १४२॥

खेदवर्षकरकाभिराहते मोदहेतुरिह नो मनागपि ।
कापथे पुनरिदं प्रवर्तते कष्टमीश्वर मनो रुणत्सि नो ॥ १४३॥

इष्टमेतदिति वेङ्कटेश्वर स्वल्पमप्यमल नैव चिन्तये ।
पारतन्त्र्यपरिकर्मितस्य मे तन्न युज्यत इति स्थितः पुनः ॥ १४४॥

अञ्जनेश भुवि रञ्जयन्श्रितान् भञ्जनं न कुरुषे ममैनसः ।
कञ्जलोचन कृपानिधे कथं कल्मषक्षपणनामकीर्तन ॥ १४५॥

पापमच्युत कृतं पुनःपुनर्धीहरं खलु मयाऽनुभूयते ।
पुण्यमस्ति यदि मे यदृच्छया पद्मवासरसिकेश पाहि माम् ॥ १४६॥

दुष्कृतस्य करणे दृढं मनः दूयते पुनरथो मनागिव ।
प्रत्यहं यदिदमीदृशं हरे कीदृशी गतिरहो भविष्यति ॥ १४७॥

नास्ति मे गतिरनन्यवत्सल श्रीनिधे सकललोकरक्षक ।
देहि दिव्यजलदोपमद्युते तापशान्तिमभयङ्करो भव ॥ १४८॥

यावदच्युत पवित्रमानसप्राज्ञसादरसुभाषितास्पदम् ।
जीवितं सकललोकमानितं तावदस्तु न तु चेत् मृतिं कुरु ॥ १४९॥

देशिकैरनघदिव्यमानसैरादृते पथि भवन्मनोहरे ।
श्रीनिवास कृपया मनाग्गतं पार्श्वगर्तपतनाच्च पाहि माम् ॥ १५०॥

अम्बुजासनमुखैस्सुरैस्स्तुतं तुम्बुरुप्रभृतिगीतमप्यहम् ।
शम्बरारिविवशोच्युतं श्रये त्वं बलेन तव रक्ष माधव ॥ १५१॥

कामलेशहतचेतनो न यो माननीयविभवस्स संसृतौ ।
सर्वशेषिशुभदिव्यदम्पतिप्रीतिमात्रमपि किन्न काम्यते ॥ १५२॥

सर्वकामपरिपूर्णसेवया घोरकामवशता विनश्यति ।
अद्भुतं तमिममञ्चनाचलद्योतमाश्रय मनः परां गतिम् ॥ १५३॥

इन्द्रियाणि न वशे मनागपि श्रीनिवास तमसा वृत्तोऽस्म्यहम् ।
जातु हन्त भवता भवत्प्रियैश्चेक्षितं सपदि मामुपेक्षसे ॥ १५४॥

रक्ष सम्प्रति रमानिवास मां रागसम्भृतपरागपांसुलम् ।
कालमेघ करुणारसैश्शुभैश्शोधयन् विहितशुद्धजीवनः ॥ १५५॥

वेदपर्वतशिरस्स्थितं पदं वेद यत्तव रमानिधे जनः ।
वेदनाभिरनुपप्लुतस्सुखं वेद सोऽत्र च परत्र चाखिलम् ॥ १५६॥

इत्थमाश्रितजनावनप्रियं देवदेवमनघं दयानिधिम् ।
श्रीनिवासमिह वीरराघवो दुष्कृतोद्यमहतीप्सयाऽऽश्रितः ॥ १५७॥

उपनिषद्भिरुदीरितमादरादुदयतामुपबृंहणवर्णितम् ।
सुरमहर्षिमुखस्तुतमद्भुतं मनसि सिंहमहीधरणं महः ॥ १५८॥

किमिह नः कथया भवितान्यया त्वनयकल्पितया कथयानया ।
अवहितं भव वेङ्कटभूधरे तव हितं निहितं महितं मनः ॥ १५९॥

प्रणतलोकपरायणमानसं प्रणमत प्रणयेन परायणम् ।
निखिलवेदगवेषितमद्भुतं वृषमहीधरदीप्तमिदं महः ॥ १६०॥

निखिलतापनिबर्हणचुञ्चुना नियमितस्वकयुग्मविभूतिना ।
श्रितरमः करुणासहचारिणा दिशति वीक्षितकेन स नस्सुखम् ॥ १६१॥

सकलहंससमाश्रयणीयतां सकलहंसमिदं मणिनूपुरैः ।
सपदि नः प्रतिपादयतीव ते कमलकान्ति पदं कमलापते ॥ १६२॥

हितकृते कृपयेह महीतले महितमञ्जनशैलमधिश्रितम् ।
अनघमद्भुतमङ्गलविग्रहं कमपि यामि गतिं कमलानिधिम् ॥ १६३॥

आश्चर्यभूतनिरपायदयामयीभि-
रार्द्रीकृताखिलवृषाद्यचलस्थलाभिः ।
बद्धादराऽऽहितनिमज्जनपावनीभि-
र्धाराभिराढ्यमवनीधरमाश्रितोऽस्मि ॥ १६४॥

अभितो विशोभिगिरिकूटशेखर-
द्रुमशृङ्गतुङ्गतरशाखिकोज्ज्वलैः ।
अधिनीरजातललितैरनोकहै-
र्हृदि पापनाशशुभतीर्थमस्तु नः ॥ १६५॥

इतस्ततो भिन्ननिजप्रसारया
प्रभूतपापक्षयवारिधारया ।
अदभ्रवेगोत्थकणाऽऽहिताभ्रया
मनश्शरीरञ्च ममास्तु शोधितम् ॥ १६६॥

आकाशगं गामपि सम्प्रविष्टं
आकाशगङ्गासलिलं महान्तः ।
श्रेय प्रदं संविनियोजयन्तो
भजन्ति लक्ष्मीश भवत्प्रियत्वम् ॥ १६७॥

सहस्रसूर्योज्ज्वलदिव्यतेजस-
स्सरोजवासासहधर्मचारिणः ।
सुखैस्सुशीतैर्हरितैः प्रभाभरैः
वनं मुदे तद घनपत्रचित्रितम् ॥ १६८॥

वने निवासोऽप्यवनेन जीविता
जनेष्वसक्तिर्जनतापहारिता ।
घने स्थितिस्त्वय्यघनाशशीलता
त्वदद्रिलीनेषु हरे जनेरिताः ॥ १६९॥

हरे गिरेरस्य हि सर्वतोमुख-
प्रदानशुद्धान्तरभावशोभिताः ।
निवासिनोऽन्ते स्वयमात्तगौरवा
भवन्ति मान्या मुदिरा भवत्पदे ॥ १७०॥

न श्रधा न मतिः न शक्तिरथ मे किं स्याददृष्टं शुभम्
धूर्तानां मम चास्ति का खलु भिदा वेषः प्रजामोहनः ।
हे शेषाचलशेखरेश्वर रमानाथ प्रभो शाश्वत
ज्ञानानन्दविभूतिनायक नय त्वं मां स्वयं सत्पथम् ॥ १७१॥

अन्तर्मे न हि मात्रयापि भवति प्रेम श्रियः प्रेयसि
स्वामिन्यद्भुतनिस्समाधिकगुणग्रामे शुभालम्बने ।
कामोऽथापि भवद्विलोकनविधौ कामैकवश्यस्य मे
बाष्पस्वेदसगद्गदस्वरमुखप्राप्त्यै कथं युज्यते ॥ १७२॥

भक्ताः केचन पावितन्निजगतस्त्वय्येव् पातिव्रतीं
बिभ्राणास्तव पादपद्मनतये शैलं समायान्ति ये ।
तादृक्षाः मयि नित्यदुष्टहृदये नाथ प्रभो नीरद-
श्याम श्रीधर वीक्षणं सकरुणं याचे क्षिपन्तु स्वयम् ॥ १७३॥

कामार्तन्न कथं मनो मम हरे यन्नाम नारीमयीं
हा कष्टं प्रतिमामपीक्षणपदं प्राप्तां जहात्येव न ।
कल्याणे कमनीय उज्ज्वलतमे कालाम्बुदश्यामळे
काङ्क्षाकरुपतरौ वृषाचलमणौ कुर्यात्कदैतां रतिम् ॥ १७४॥

भाग्यं भूरि वृषाचलेश कलये स्त्रीजन्महेतुं यतः ।
तारुण्योज्ज्वल तोयवाहसुभगे त्वय्यस्तु लीनं मनः ।
एतत्साम्प्रतमम्बुजेक्षण यथा गोप्योऽपि कृष्णे त्वयि
प्रेमोद्गारकषायिकोमलहृदो नैवं मुनीन्द्रा यतः ॥ १७५॥

आचार्यैरुपदिष्टमस्ति सुदृढं सञ्चिन्तितञ्च स्वयं
नातो बाह्यकुदृष्टिमोहनवशं मन्ये मनो यास्यति ।
एवन्त्वेपि यदञ्जनाद्रिशिखरप्रद्योत लक्ष्मीनिधे
त्वद्रूपानुभवस्थमस्ति न मनः पापिष्ठमेतत्ततः ॥ १७६॥

आगत्यान्तरवेक्षणाय भवतश्चित्तं न यत्तं बत
प्रस्थाने कृपया बहिश्च मनुते प्रान्ते समायात्विति ।
ईदृक्तन्द्रि महाघमेतदनघं त्वाञ्चेत् दिदृक्षेत जा-
त्वेतद्वेङ्कटशैलनाथ भगवन् प्रत्यूहितं मा कुरु ॥ १७७॥

त्वामेष प्रणतोऽस्मि ते परिजनान् येऽन्ये त्वदीयाश्च तान्
मा मे जातु मनः क्रुधा कलुषितं भूयाद्वृषाद्रीश्वर ।
सह्यं सर्वमहो विचिन्त्य बहुना यज्जन्मना स्वार्जितम्
क्रोधः किन्तु महागसे पुनरतश्शान्तोऽस्मि वीक्षस्व माम् ॥ १७८॥

बुध्धा यानि कृतानि सम्प्रति कथं पापानि तानि प्रभो
न स्मर्यन्त इहाञ्जनेश्वर मनो धूर्तं मदीयं ध्रुवम् ।
स्थातव्यन्तु यथा तथा न भवितुं यत्नो भवन्तं पुन-
स्माक्षेपं स्मरयामि सर्वसमतां लक्ष्म्या सह त्वं हस ॥ १७९॥

दूरेऽपोहय दुष्कृतानि कृपया पुण्यानि चेत्सन्ति मे
तानि श्रीश बलात्समूहय मयि प्रेम स्वय पोषय ।
हे गोपीजनबान्धव प्रणिपताम्यन्या गतिर्नास्ति मे
तत् त्वं तत्त्वमनुत्तमं तव पदद्वन्द्वं सुखं दर्शय ॥ १८०॥

भ्राजत्पीतसुवर्णचित्रवसनं काञ्चीकृतालङ्क्रियं
सालग्रामसुवर्णरत्नकुसुमप्रख्यातमाल्याञ्चितम् ।
कान्तं ते घनसारपुण्ड्रललितस्मेरारविन्दोल्लस-
द्वक्त्रं दिव्यकिरीटमञ्जनपते रूपं स्वयं दर्शय ॥ १८१॥

विरक्तगृहस्थप्रार्थना
श्रीमानेष वृषाचलेन्द्रशिखरप्रान्तप्रदीपायित-
स्वैरव्यक्तसमस्तमङ्गलनिधिश्रीमूर्तिराधित्सताम् ।
पद्मापादपयोजयुग्मविगलल्लाक्षापदेशोज्ज्वल-
न्मन्दस्यन्दिमरन्दमेदुरमहोरस्को विरक्तिं मम ॥ १८२॥

कृत्याकृत्यविवेकदुर्विधमहानर्थोपनद्धोन्मद-
प्राज्ञंमन्यकरत्यजद्दरदृढप्रोन्माथि मन्मानसम् ।
तन्मे सम्प्रति तं प्रति प्रणतयस्सन्तु प्रियो यश्श्रियः
प्रेमार्द्रं प्रणिधापयेन्मन इदं कामञ्च निर्यापयेत् ॥ १८३॥

शृङ्गे शेषभुङ्गपुङ्गवगिरेस्तुङ्गे परं मङ्गलं
शृङ्गारं तमनङ्गभङ्गविधये सोऽहं शरण्यं गतः ।
यो लक्ष्मीमुखपद्मलम्भितमहामोदानघापाङ्गित-
श्रेणीभृङ्गपरम्परास्वरसमस्वाङ्घ्रिश्रितस्वागतः ॥ १८४॥

यत्खल्वाश्रममद्वितीयमनघं तत् सद्वितीयं श्रियः
प्रेयः प्राप्तमिदं द्वितीयमिह मे धर्मः परं वर्धताम् ।
मा भूदञ्जनशैलशेखर हरे त्वत्पादपङ्केरुह-
प्राप्तस्यास्य कदापि कामकदनस्वल्पप्रसङ्गोऽपि मे ॥ १८५॥

इज्यौपासनवैश्वदेवविधिना पूर्वं परञ्चाश्रमं
प्रत्यप्यन्नसमर्पणेन सुहितां वृत्तिं सुखं प्रेप्सतः ।
श्रीमन्नञ्जनशैलशृङ्गविलसत्सन्तान सङ्कल्पय
स्वेनैव स्वककिङ्करत्वविभवस्थैर्यं सयूथस्य मे ॥ १८६॥

त्वामेवानुभवन्निरन्तरमहं त्वत्पाददास्यप्रियः
त्वत्प्रीत्यै नियतं विधाय विधिवत्सर्वं गृहस्थोचितम् ।
कामोद्दामकदर्थनानि कमलाकान्त प्रभावेण ते
दूरीकृत्य कृतार्थयेयमनिशं दीनं मदीयञ्च माम् ॥ १८७॥

यस्तु प्राथमिकाश्रमस्स भगवन् क्षिप्रं व्यतीयाय मे
वानप्रस्थ इतीदमद्य जगति प्राप्तं भृशादर्शनम् ।
संन्यासस्तु गृहस्थधर्मवहनव्याक्षिप्तनैजस्थितिः
तद्गार्हस्थ्यमिदं विधत्स्व नियतं धर्म्यं प्रियं ते मम ॥ १८८॥

इत्थं वेङ्कटशैलशेखरपदाम्भोजद्वयैकप्रियः
कन्दर्पोद्भटदर्पधूननकृते देवं तमेव श्रयन् ।
धर्म्ये वर्त्मनि वीरराघवकविर्वाञ्छन् शुभं वर्तनं
तत्तः प्रार्थितवानथास्य पठिताप्यस्त्वेतदीक्षापदम् ॥ १८९॥
अधमर्णप्रार्थना
श्रीकान्त श्रितसर्वलोकशरण श्रेयोनिधे शाश्वत
स्वाधीनाखिल शान्त वत्सल शुभप्रज्ञानशक्त्युज्ज्वल ।
देवाधीश वृषाचलेश्वर दृढं त्वत्पादपद्मप्रियः
त्वद्भृत्यस्तव किङ्करोऽस्मि किमिति प्राप्तोऽस्मि कष्टां दशाम् ॥ १९०॥

वेदो मानमशेषतस्स भगवांस्त्वं दैवतं केशवः
मान्याः व्यासपराशरादिमुनयो निष्कम्पनिर्धारकाः ।
सत्येवं वृषशैलशेखर कथं त्वत्पादपद्मद्वयीम्
आश्रित्यापि जनोऽयमित्थमधुना कष्टस्य काष्टां गतः ॥ १९१॥

उद्दिश्याङ्घ्रिमुदार ते यदि भवेदेकोऽभिनीतोऽञ्जलिः
केनाप्यच्युत कृत्स्नमस्य वृजिनं मुष्णासि पुष्णासि शम् ।
तत्तादृक्प्रथपद्मवासरसिकालङ्कारवक्षस्स्थल
प्राज्ञैरित्थमुदीरितोऽसि तदिदं काले त्वया स्मर्यताम् ॥ १९२॥

कालोऽयं कलिरत्र कल्पितमभूज्जन्म त्वयेदं तु नः
तस्मादस्मदिहास्ति कर्म नतरां भूयः प्रतीक्ष्यं त्वया ।
कामं मोक्षपथस्स मास्तु सकलं त्वन्यत्तदेकोद्भवं
तत्किं नामनि वेङ्कटेश फणितोऽप्येवं न सन्तुष्यसि ॥ १९३॥

नाहं संसृतिसागरान्तरमहावर्तभ्रमं प्रार्थये
नो वा त्वामपहाय दभ्रचिदनुस्वादक्षणं कामये ।
नो वा सम्प्रति रङ्गलक्ष्मणमुनिन्यस्तात्मरक्षाभरः
त्वत्तस्त्वत्पदपद्मसेवनमहानन्दञ्च याचे स्वयम् ॥ १९४॥

श्रीमन्नञ्जनशैलशेखर हरे स्वामिन्निदं शिष्यते
यत्ते पादपयोजसेवनमिहाऽऽदेहावसानेप्सितम् ।
तत्तुभ्यं मयका मदीयकयुजा निर्वर्तय त्वं स्वयं
दूरीकृत्य भयं दयाजलनिधे दोषैकराशेर्मम ॥ १९५॥

उत्पाद्य स्वयमुत्तमे खलु कुले विद्यासु युक्तास्वपि
व्यत्पाद्याद्भुतदेशिकाङ्घ्रिकमलात्सम्पाद्य यत्साम्प्रतम् ।
वात्सल्येन वृषाचलेश नयतो वर्त्म स्वयं साधु माम्
अन्ते हन्त कथं नु घोरवृजिनारण्ये विसर्गे मतिः ॥ १९६॥

स्थातुं युक्तमसंशयं समधिया मानावमानद्वये
नैवाथापि निदेशलङ्घनकृतं सह्यं सतां गर्हणम् ।
आज्ञापालनतत्परस्य यदि मे कामो न सङ्कल्प्यते
पद्माकान्त सुपुत्रहानिविहितश्शोको भवन्तं दहेत् ॥ १९७॥

हा हा हन्त मुकुन्द हास्यति कदा चिन्ताज्वरो मानसं
सर्वोप्येष वृथैव याति समयो दास्येऽपि तिष्ठासतः ।
आकर्षन्ति यथायथं न च परीहारे मनाक् प्राभवं
नाथ त्वां शरणं गतस्य ऋणिता श्रीकान्त नैवोचिता ॥ १९८॥

अद्य श्वस्तदनन्तरे दिवस इत्येवं मृषाभाषितैः
अर्थापेक्षिणमुत्तमर्णनिवहं नित्यं हरे वञ्चयन् ।
सर्वं नारकमञ्जनाद्रिशिखरालङ्कार चेत्प्राप्नुयां
त्वत्कीर्तिर्मम दास्यवृत्तिरपि हा नूनं लयं यास्यतः ॥ १९९॥

श्रीमन्नीदृशसाधुवर्त्मनयनप्राप्तं यशस्ते स्थिरं
कर्तुं किञ्च ममापि जन्म सफलीकर्तुं व्यवस्यन्निह ।
दासे देव दयातरङ्गितशुभापाङ्गाल्पविक्षेपतः
क्षिप्रं सर्वमृणं विधूय मम देह्यत्यन्तदास्यं त्वयि ॥ २००॥

इत्थं वेङ्कटशैलशृङ्गनिलयं सर्वार्थविश्राणनं
श्रीमन्तं हरिचन्दनं कुलधनं देवं परं संश्रयन् ।
प्रेमोद्गारकषायितेन मनसा कैङ्कर्यविघ्नक्षयं
काङ्क्षन्नस्तुत वीरराघवकविः क्षेमाय देवोऽस्तु सः ॥ २०१॥
पाणिमुद्रास्तवः
पार्थं पुरा प्रणयतः पुरतो निषाद्य
पद्यं यदुत्तमरहस्यमसावगासीः ।
संसेव्य वेङ्कटपतेऽत्र तदर्थदर्शि
हस्तेङ्गितं तव किमप्यभिधित्सुरस्मि ॥ २०२॥

वाचामगोचरमनन्त पदाब्जयोस्ते
वेदेषु वैभवमशक्ततमेषु वक्त्रुम् ।
का नाम मादृशमहाजडदुष्टवाचाम्
कार्ये वृषाचलपतेऽत्र कथा प्रवृत्तौ ॥ २०३॥

आशावशेन बहुधा विरचय्य कर्मा-
प्याशाधिपा मकलेषु मतङ्गजेषु ।
न्यस्तासना इह पतन्ति जनाः फलं तत्
नित्यं लभध्वमिति वक्षि करेण किं त्वम् ॥ २०४॥

दिव्यस्समस्त्यकृतकस्तमसः परस्ता-
दन्यस्स कश्चिदिति किन्नु मुधाऽभिमत्या ।
भक्तैः प्रपत्तृभिरपि त्वपुनर्गतीदं
प्राप्यं परम् पदमिति प्रणयिन् ब्रवीषि ॥ २०५॥

क्षेत्रं महिष्ठमिदमादिवराहदेव
कारुण्यकन्दलकटाक्षविनष्टकष्टम् ।
दत्ते त्रिवर्गमपवर्गमपीह तस्मात् ।
वस्तव्यमित्युपदिशस्युचितं रमेश ॥ २०६॥

आरुह्य सप्त तव सेवनकाङ्क्षयाऽद्रीन्
आगच्छतः करुणया कमलेश पश्यन् ।
अत्रैव तिष्ठत मदद्भुतदिव्यरूप-
दृष्टिप्रनष्टदुरिता इति किं ब्रवीषि ॥ २०७॥

काकासुरेण कृतघोरविचेष्टितेन
काले जगत्रयपरिभ्रमणं विधाय ।
यस्मिन्पदे निपतितं शारणार्थिना प्राक्
एतत्तदाश्रयत श्रीघ्रमिति ब्रवीषि ॥ २०८॥

सन्ति प्रलोभनपराः फलमल्पमेव
दक्षाः प्रदातुमधरोत्तरमाशु देवाः ।
सर्वत्र तत्र भविनां न सुखावकाशः
तन्मे पदं शरणमाश्रयतेति वक्षि ॥ २०९॥

ये नाम केचन भवादृशवाञ्छितार्थ-
दोहप्रभावभरिताः प्रथितास्त्रिलोक्याम् ।
तेप्येतदङ्घ्रिसरसीरुहपूजनेन
प्राप्ताः प्रभुत्वमिति किन्नु हरि ब्रवीषि ॥ २०९॥

कामं भवेद्विविधनश्वरपूरुषार्थ-
लिप्साकुलं परवशं ललितं मनो वः ।
तत्तादृशं सकलमप्यधिकं लभेध्व-
मेतत्पदाम्बुजमुपाय इति ब्रवीषि ॥ २१०॥

अर्थ्यं फलं सकलमप्यचिरेण दातुम्
अर्चामिमामुपगतोऽस्मि दयैकरूपाम् ।
कर्तव्यमप्यतिलघु प्रणिपातरूप-
मेतत्पदाब्ज इति देव हितं ब्रवीषि ॥ २११॥

व्याजेन केनचिदशेषमपीश्वर त्व-
मानाध्य लोकमनुकम्पिकटाक्षितस्सन् ।
अन्यद्विमुञ्चत् फलं सकलं फलं वः
पादाब्जमेव मम नित्यमिति ब्रवीषि ॥ २१२॥

देवी दयेव दयिता हृदयं श्रिता सा
नित्याश्च केचन शुभायुधभूषणाद्यैः ।
रूपैर्यथोचितमवाप्तमदङ्गभागाः
तद्वः कृते पदमिदन्त्विति वक्षि सद्भ्यः ॥ २१३॥

मा नाम भूद्भयमुपाश्रयतां मनाग-
प्यह्नाय ते स्वयमिदं मम पादपद्मम् ।
यें वो भयानकमताः मम हेतिभीताः
प्राप्स्यन्ति जीवितुमिति प्रथयस्यनन्त ॥ २१४॥

कामैकभोगविवशांस्त्रिदशानुपेत्य
तेषां पशूभवितुमिच्छथ हन्त कस्मात् ।
तस्माद्वरं विविधसच्चरणार्हभूमा-
वत्रैव वस्तुमिति बोधयसि प्रभो त्वम् ॥ २१५॥

आराधनेषु विविधेष्वधिवेदमुक्ते-
प्वेतत्पदाब्जयजनं परमस्ति सन्तः ।
आराधनं परतरन्त्विदमाश्रिताना-
मित्यादरेण वृषशैलमणे ब्रवीषि ॥ २१६॥

एषा विभूतिरियतीदमुपर्यसौ मे
नित्या त्रिपादिति करेण परेण चोक्त्वा ।
बम्भ्रम्यमाणमिह भव्यजगन्मय त्वं
लोकं निनीषुरवलोकयसे पदं ते ॥ २१७॥

अत्युच्छितः परित एष धराधरेन्द्रः
पादेन पश्यत मयैवमधःकृतोऽत्र ।
इत्थं मवद्वृजिनराशिमधो विदध्या-
मातः पदं प्रणमतेति वदस्यनन्त ॥ २१८॥

गृह्णन्ति येऽत्र कुसुमानि कृतेषु साक्षा-
दभ्यर्चनेषु चरणैरमराः महान्तः ।
क्षिप्तानि तेत्विह वहन्ति शिरोभिरेता-
न्यर्च्यं पदं तदिदमित्यधिदेव वक्षि ॥ २१९॥

त्रैविक्रमश्चरण एष जगद्व्यधात्प्राक्
वज्रातपत्रमुखचिह्नविशिष्टशोभम् ।
एकातपत्रवहवज्रधरादिभाव-
लिप्सा यदि प्रणमतेति वदस्यनन्त ॥ २२०॥

स्थानात्सुदूरमवतीर्णवतस्ततस्ते
जङ्घान्तपादयुगलश्रमयापनाय ।
भक्तान्नियोजयसि यस्य तवाद्भुतस्य
प्रेक्षालवप्रशमितश्रम एष लोकः ॥ २२१॥

भक्तव्रजं वृषगिरीन्द्र विमोहनं त्वां
स्त्रीभावतस्त्वनुबुभूषुमनुग्रहीतुम् ।
प्राङ्मैथिलीपरिणयात्कृतगौतमस्त्री-
रूपं दृषद्यमल लम्भयसेऽङ्घिरेणुम् ॥ २२२॥

सा पादुकापि पदपङ्कजधारनात्प्राक्
साकेतराजपदमुत्तममध्यतिष्ठत् ।
तस्मादिदं शिरसि धारयतां करस्थः
क्षेमस्सयोग इति वक्षि वृषाचलेन्द्र ॥ २२३॥

मद्दिव्यशाखचरणैकपरायणत्वा
च्छाखेति वीक्ष्य चरणेत्यपि च प्रसिध्दिम् ।
वेदस्स मां गिरिवपुर्वहतीह भक्त्ये-
त्येवं सुपर्णगिरिशृङ्गमणे ब्रवीषि ॥ २२४॥

सत्यादिलोकनिलयांस्तव सेवनार्थे
वैकुण्ठलोकगमनोद्यमिनस्सुरान्त्त्वम् ।
अत्रागतोऽस्मि वृषशैल इति ब्रवाणो
वित्रासितासुर समाह्वयसीति मन्ये ॥ २२५॥

ज्ञानात्मके च भुवने जलधेश्च मध्ये
मान्येषु ते निगमराजशिरस्सु नित्यम् ।
तुल्यम् श्रियःकमन निस्स्वपरार्थबुद्धि-
ष्वप्याविभातमुपदर्शयसेंऽघ्रिपद्मम् ॥ २२६॥

संसारवारिधिरयं भवतामगाधो
जङ्घामितं जलमिवास्ति सुखेन लन्ध्यः ।
मत्पादपद्मयुगलप्रणिपातमात्रा-
दित्यादरेण वदसीव वृषाद्रिनाथ ॥ २२७॥

एवंविधानि विविधानि विबोधयंस्त्वं
विश्वं जनं निजपदाम्बुजसेवनेन ।
धन्यं तनोषि दयया वृषशैलशृङ्गे
नित्यं स्थितोऽत्र निरपायरमानिवास ॥ २२८॥

इति पाणिमुद्रास्त्वः
नाथ श्रियो नळिनसुन्दरमाश्रयंस्ते
पादं पवित्रमपनीतसमस्तखेदः ।
सार्वज्ञ्यरम्यसकलाद्भुतशेषवृत्ति-
धन्यो बुभूषति दयाम्बुनिधे ममाऽऽत्मा ॥ २२९॥

नाथस्स एष नरकच्छिदपारशक्ति-
र्नाकस्य पृष्ठ इव नः प्रकटे प्रकृष्टे ।
नारायणाचल इह स्वयमावरात्मा
भूमा रमासहचरः स्वगुणैस्समिन्धे ॥ २३०॥

एष श्रिया सह हरिश्शुभदिव्यमूर्ति-
श्श्रेयो जनस्य सकलस्य विधित्सुरस्मिन् ।
शेषाचले जयति वेङ्कटनाथनामा
किं भो जनास्तदितरत्र भजध्वमेनम् ॥ २३१॥

ये नाम केचन रमेश समेश कर्म-
वैचित्र्यतः कलितबाह्यकुदृष्टिपक्षाः ।
तेपि त्वदीयमनघं विभवं समीक्ष्य
वश्या भवन्ति तव कस्सदृशस्ततोऽस्तु ॥ २३२॥

त्वामद्वितीयमखिलाश्श्रुतयो गृणन्ति
श्रीमन् सदैव रमयापि च सद्वितीयम् ।
त्वद्भूमदर्शनसुखाम्बुनिधौ निमग्नाः
नैवान्यदम्बुजविलोचन लोकयन्ति ॥ २३३॥

हा हा किमेतदधरोत्तरमद्य लोक-
स्सञ्चेष्टमान इति सात्त्विकसङ्घवादः ।
सर्वज्ञ भावि परिशीलयतः कलौ ते
साधुत्वबुध्दिरिह चेत न रमेश भीर्मे ॥ २३४॥

शक्तिस्तवास्त्यनवधिर्हि यथा तथैव
श्रीकान्त सन्त्यनवधीनि ममप्यधानि ।
सर्वाधिकस्य तव साम्यमिदं न युक्तं
तत्त्वं विचिन्त्य दययोचितमत्र कुर्याः ॥ २३५॥

आमञ्जुनृपुरमहामकुटं भवन्तम्
आस्थापरेण मनसा च दृशा विलोक्य ।
आनन्दसागरनिमज्जनभाग्यधन्याः
मान्याः श्रियः कमन सन्तु मयि प्रसन्नाः ॥ २३६॥

सा सर्वलोकजननी सकलार्तिहन्त्री
सामादिभिस्त्वयि दयामभिवर्धयन्ती
त्वय्येकतामुपगता लसतीह यैषा
त्वञ्च श्रियो निलय नश्शरणं भवेतम् ॥ २३७॥

सर्वान्तरात्मभवनं सकलेषु तुल्यां
वृत्तिं सदैव रमयापि च साहितीं ते ।
नारायणाचलनिवासरताभियुक्ताः
सम्यभ्विभाव्य सममेव भवन्तमाहुः ॥ २३८॥

तद्धाम दिव्यमनघं तपसाप्यगम्यं
सङ्कल्पितं हि भवता न ममात्र खेदः ।
यत् त्वां तथैव रमयाद्य वृषद्रिशृङ्गे
पश्यामि सादरमशेषसमन्वितोऽहम् ॥ २३९॥

आसेतुबन्धहिमशैलमनन्तभेदाः
लोका भवन्तमनपायदयानिधानम् ।
आनम्रवाञ्छितविधानपरावतार-
माराधयन्ति रमया सहितं स्वशक्या ॥ २४०॥

अम्भोजनेत्रमपहाय रमासहायं
कं भो जनाः भजथ हन्त वृथा विमुग्धाः ।
सर्वेष्टदस्सकलदेवपतिस्स एष
शेषाचले विहरतीह हि वो हिताय ॥ २४१॥

विश्वस्य याचतु फलं तदिहेति बुध्या
विश्वस्य विश्वमिहलोकफलं दुहानः ।
त्वल्लब्धभूतिविधिशम्भुमुखान्यदेव-
सेवारतिं शमयसीव वृषाद्रिवासिन् ॥ २४२॥

वैकुण्ठतो वृषगिरिं स्वयमच्युत त्वाम्
आनीय तेऽङ्घ्रियुगमाश्रयितुं जनौघम् ।
या प्रेरयत्यध इतोप्यवतीर्य तस्याः
प्रीत्यै श्रियो मयि निधेहि दयार्द्रदृष्टिम् ॥ २४३॥

दिव्ये प्लवे विविधवैद्युतदीपरत्न-
भव्ये भवन्तमिह सम्प्रति पुष्करिण्याम् ।
श्रीशैलनाथ सहितं रमया च भूम्या
दासस्समीक्ष्य च विनस्य च धन्य एषः ॥ २४४॥

सुस्निग्धवृत्तरुचिरस्फटिकावदात-
स्थूणोपशोभिनि विचित्रविमानमान्ये ।
विभ्राजमानशुभवैद्युतदीपङ्क्तौ
स्वज्योतिषा प्लव इहाऽद्रिपते विभासि ॥ २४५॥

श्रीमन् वृषाचलवराञ्चलवल्लभ त्वा-
माश्रित्य सन्ततभवत्पदपद्मसक्तः ।
पापादपायनिचयान्निरयाच्च सम्य-
गात्मानमात्मजनमप्यवितुं प्रयाचे ॥ २४६॥

सर्वज्ञ ते न विदितं किमिदं मनो गे
सर्वेषु शक्त न कुतस्स्तवने नियोज्ये ।
मुक्तादिनेव किमितोऽस्ति मया फलं ते
बद्धो यदस्मि भगवन् स परस्समाधिः ॥ २४७॥

आशावशाद्वृषगिरीश तथानुरूप्यात्
अज्ञातशक्तिरहमीडितुमध्यवस्यन् ।
अन्यत्र कालमखिलं सरसं क्षिपन् यत्
त्वां प्रस्मरामि तदिदं भगवन् क्षमस्व ॥ २४८॥

गीतोपदेशनिरतः पवनात्मजात-
केतोः पृथातनुभुवो रणदेशमध्ये ।
व्याख्याङ्कशोभिकरपद्मदलस्स नूनं
गोविन्दराज इह वेङ्कटवल्लभ त्वम् ॥ २४९॥

त्वय्येव मे मतिरियं नियता विभातु
त्वत्पादपङ्कजधनेन च धन्यता स्यात् ।
त्वत्सुन्दराङ्गपरिचिन्तनलब्धभूमा
त्वत्किङ्करः कमललोचन वर्तिषीय ॥ २५०॥

श्रीवेङ्कटाद्रिसदृशं न हि किञ्चिदस्ति
श्रीवेङ्कटेशसदृशो न च जातु कश्चित् ।
तत्पादपङ्कजपरागपवित्रितेन
देहेन तत्परिसरे सुकृती भवानि ॥ २५१॥

वज्रायुधादिविबुधव्रजवन्द्यमानं
वज्रैकभूषणविभूषितमुज्ज्वलम् त्वाम् ।
वज्रात्कठोरतरमप्यतिमूर्खचित्त-
माशु द्रवं रचयितुं प्रभुमाश्रितोऽस्मि ॥ २५२॥

किं नाम चिन्तयसि दासजने न जाने
देहान्तकालपरमावधि कार्यमत्र ।
शास्त्रश्रमेण विकलः कुत एव भक्तः
प्रत्यक्षितं स्वपरम्भावि कुतस्तरां स्यात् ॥ २५३॥

आलोडितानि निखिलान्यपि यैस्तु शास्त्रा-
ण्याचार्यतल्लजमुखैरवधारितं त्वाम् ।
नारायण श्रितवृषाचलतुङ्गशृङ्गं
नाथं नमामि नलिनाक्षमुदारमाढ्यम् ॥ २५४॥

पादारविन्दयुगले बलवन्मनो मे
निक्षिप्तमच्युत निरस्तसमस्तदोषे ।
तत्रैव मञ्जुलमनोहरदिव्यरुक्म-
मञ्जीरशोभिनि मधुस्वदनं विधत्ते ॥ २५५॥

नाथ श्रियो नयनयोर्युगलं मदीयं
निश्शेषमङ्गलनिधिं निधिमाश्रितानाम् ।
आपादचूडमनुभूय भवन्तमेति
साहस्रनेत्रमुखसेवित नैव तृप्तिम् ॥ २५६॥

रौक्मेण भव्यमहसा मकुटेन मान्यं
चक्रेण ते कमललोचन कम्बुना च ।
नित्यं श्रिया विहितशोभभुजान्तरालं
रूपं प्रभो वृषगिरीश विभातु चित्ते ॥ २५७॥

सा मे समस्तजगतीभमाग्यभूमा
कामातिशायिकमनीयगुणाभिरामा ।
श्यामा रमारमण दिव्यसुवर्णदामा
क्षेमाय मूर्तिरियमस्तु वृषाद्रिधामा ॥ २५८॥

सिंहाचलेश्वर दिशो विदिशश्च देव-
सिंहं समाश्रयितुमेत्य जना भवन्तम् ।
सिंहाद्भयादिव भृगैर्वृजिनैर्विमुक्ताः
सिंहासनेषु महितेषु सुखं जयन्ति ॥ २५९॥

नागा हि रत्नशिरसोऽर्थपरायणास्ते
नागेशपर्वतनिवास तथाऽवनिस्थाः ।
धर्मे रता दिविभवा अपि कायमग्नाः
त्रैवर्गिकेतरदिमां गमय त्रिलोकीम् ॥ २६०॥

मध्येऽवनेरिह तथा पयसां निधाने
व्योमन्यपेततमसि स्फुटरश्मिबिम्बे ।
नित्यं विभान्तमनघं मरुतामधीशं
त्वां सर्वभूतनिलयं कलयेऽञ्जनेश ॥ २६१॥

वेङ्कटमहीध्रवरशेखरमिह त्वां
याचति यदेष इदमस्ति न न युक्तम् ।
दीन इह निर्गतिरलब्धफल एष
त्वं तु विभुरद्भुतमहागुणनिधिश्च ॥ २६२॥

वेङ्कटाधीश ते वैभवं किंविधं
केन वा शक्यते ज्ञातुमत्यद्भुतम् ।
क्षेमभाजं जनं मां भवान् भूयसा
वीक्षितेन स्वयं देव नित्यं कुरु ॥ २६३॥

दयासिन्धुः श्रीमान् दलितनिखिलारातिरधिकं
श्रियं नः पुष्णन् यश्शरणमसि कृत्स्नस्य जगतः ।
प्रभुत्वं सौलभ्यं परमपुरुषत्वं तव हरे
कदा वा को वा स्याद्गदितुमिह शक्तः कियदपि ॥ २६४॥

असामान्यं मान्यं ह्यतिवचनसौलभ्यमधुरं
प्रभुत्वं श्लाघन्ते परमपुरुष ब्रह्मनिरताः ।
अलीकस्तोत्राणामविषयमनन्ताद्भुतगुणं
तदेकस्थानं त्वां वृषगिरिपते यामि शरणम् ॥ २६५॥

अस्मादृशामयमनारतदुष्कृतानाम्
अव्याजवत्सलतया शमिताञ्जनस्सन् ।
शेषाचलेश भगवन् भवसिन्धुपोतः
पारे परत्र तनुषे परमं च साम्यम् ॥ २६६॥

प्रपद्येऽहं सद्यः पदयुगमविद्यैकनिलयो
निषद्या दोषाणां निरवधिगुणग्राममनघम् ।
मृगेन्द्रक्षोणिभृन्महितशिखरोद्यानविहृति-
प्रियश्रीवैवश्यक्षतदुरितदृष्टेस्तव हरे ॥ २६७॥
सूरीन्द्रा अपि नाथयामुनमुनिश्रीपूर्णरामानुज-
श्रुत्यन्तार्यमुखास्तथा मम गुरुस्त्रय्यन्तरामानुजः ।
शिष्यस्तस्य च रङ्गलक्ष्मणमुनिर्यं श्रीनिधिं संश्रिताः
सोऽयं सर्वगुरुस्तुतोऽस्तु नियतं श्रेयःप्रदो नः प्रभुः ॥ २६७॥

यदायत्तं विश्वं यदुपरि न किञ्चित् यत इदं
निलीनं यत्रेदं यदिदमिति चाम्नायविदितम् ।
भजे तन्निर्दोषं निरवधिकनिस्सङ्ख्यविभवं
प्रबुद्धैराराध्यं प्रपदनवशं श्रीश्रियमिह ॥ २६८॥

मनो मे मा किञ्चन्मधुमथन मृद्गातु मदनो
मृडे वाऽन्यस्मिन् वा मम भवतु मा रक्षकमतिः ।
अशेषेशे शेषाचलनिलयिनि श्रीपरिबृढे
मुकुन्दे भावो मे भवतु मुनिलोकैकसुगमः ॥ २६९॥

महत्यानन्देऽस्मिन्महितगुणसिन्धौ स्फुरति तं
विहायायं लोकः किमिति विषये हन्त सजति ।
क्षुधश्चोदन्यायाः प्रशमनमिमं ध्यायत जनाः
शरीरे जीर्णेऽस्मिन्नहि भवति तातो न जननी ॥ २७०॥

त्वयि सति खगराजक्ष्माधराधीश लक्ष्मी-
परीबृढ सकलन्नः क्षेममातन्वति द्राक् ।
किमिति कलयतीदं मानसं त्वद्विभिन्नं
भवसि च परमस्त्वं प्रापकस्सन् फलञ्च ॥ २७१॥

नियन्त्रा व्याप्तं यन्निखिलमपि लोकेषु भवता
तदेष स्वाच्छन्द्यं विजहदिह जीवो नियतधीः ।
उपेक्ष्यैतद्बाह्यं निपुणमथ सर्वान्तरमिमं
भवन्तं भुञ्जीत श्रितरम दुराशाविरहितः ॥ २७२॥

तत्तद्वर्णाश्रमसमुचितं कर्म यस्सात्विकस्सन्
यावज्जीवं त्वयि भगवति श्रीश भक्तो विदध्यात् ।
अर्वाचीनैर्न खलु स पुमान् लिप्यते लब्धशेष-
प्रख्यक्षोणीधरशिखरसंवास कारुण्यतस्ते ॥ २७३॥

पादाम्भोजयुगे प्रणम्य निहितं जङ्घागतं मानसं
जानुद्वन्द्वमुपेयिवत् परिगतश्रेष्ठोरु लब्ध्वा कटिम् ।
वक्षः श्रीमणिशोभि संश्रितमथो लोलं भुजेषु क्रमा-
द्वक्त्राब्जं समवाप्य कृत्स्नमचिरादालम्बते श्रीपते ॥ २७४॥

इत्थं निस्तुलतीर्थसप्तशिखरिप्रख्यातशृङ्गाटवी-
कुञ्जैकान्तरमाविहारपरमानन्दं परं पूरुषम् ।
श्रीवत्सान्वयवीरराघवकविः कालेषु यै र्भक्तिमान्
अस्तौषीदिह तानि सङ्कलितवान्पद्यानि सोऽयं स्वयम् ॥ २७५॥

इति तर्कार्णवेन पण्डितरत्नेन शिरोमणिना उत्तमूर्ति
वीरराघवाचार्येण विरचितं श्रीपद्मावतीस्तोत्रसहितं
श्रीवेङ्कटेशस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ Shri Venkatesh Stotra Completed.

॥ शुभमस्तु ॥

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॥ शनैश्चरस्तोत्रम् ॥ – Shani Stotra


Shani Stotra
Shani Stotra

Shani Stotra

श्रीगणेशाय नमः ॥

अस्य श्रीशनैश्चरस्तोत्रस्य । दशरथ ऋषिः ।
शनैश्चरो देवता । त्रिष्टुप् छन्दः ॥

शनैश्चरप्रीत्यर्थ जपे विनियोगः ।
दशरथ उवाच ॥

कोणोऽन्तको रौद्रयमोऽथ बभ्रुः कृष्णः शनिः पिंगलमन्दसौरिः ।
नित्यं स्मृतो यो हरते च पीडां तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ १॥

सुरासुराः किंपुरुषोरगेन्द्रा गन्धर्वविद्याधरपन्नगाश्च ।
पीड्यन्ति सर्वे विषमस्थितेन तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ २॥

नरा नरेन्द्राः पशवो मृगेन्द्रा वन्याश्च ये कीटपतंगभृङ्गाः ।
पीड्यन्ति सर्वे विषमस्थितेन तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ ३॥

देशाश्च दुर्गाणि वनानि यत्र सेनानिवेशाः पुरपत्तनानि ।
पीड्यन्ति सर्वे विषमस्थितेन तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ ४॥

तिलैर्यवैर्माषगुडान्नदानैर्लोहेन नीलाम्बरदानतो वा ।
प्रीणाति मन्त्रैर्निजवासरे च तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ ५॥

प्रयागकूले यमुनातटे च सरस्वतीपुण्यजले गुहायाम् ।
यो योगिनां ध्यानगतोऽपि सूक्ष्मस्तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ ६॥

अन्यप्रदेशात्स्वगृहं प्रविष्टस्तदीयवारे स नरः सुखी स्यात् ।
गृहाद् गतो यो न पुनः प्रयाति तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ ७॥

स्रष्टा स्वयंभूर्भुवनत्रयस्य त्राता हरीशो हरते पिनाकी ।
एकस्त्रिधा ऋग्यजुःसाममूर्तिस्तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय ॥ ८॥

शन्यष्टकं यः प्रयतः प्रभाते नित्यं सुपुत्रैः पशुबान्धवैश्च ।
पठेत्तु सौख्यं भुवि भोगयुक्तः प्राप्नोति निर्वाणपदं तदन्ते ॥ ९॥

कोणस्थः पिङ्गलो बभ्रुः कृष्णो रौद्रोऽन्तको यमः ।
सौरिः शनैश्चरो मन्दः पिप्पलादेन संस्तुतः ॥ १०॥

एतानि दश नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।
शनैश्चरकृता पीडा न कदाचिद्भविष्यति ॥ ११॥

॥ इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे श्रीशनैश्चरस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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|| श्री गणेश संकटनाशन स्तोत्र ||


|| Shri Ganesh Sankatnashan Stotra ||

Shri Ganesh Sankatnashan Stotra

नारद उवाच

प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्
भक्तावासं स्मरेनित्यम आयुष्कामार्थ सिध्दये ॥१॥

प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्
तृतीयं कृष्णपिङगाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम ॥२॥

लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धुम्रवर्णं तथाषष्टम ॥३॥

नवमं भालचंद्रं च दशमं तु विनायकम्
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम ॥४॥

द्वादशेतानि नामानि त्रिसंध्यं य: पठेन्नर:
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिध्दीकर प्रभो ॥५॥

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थी लभते गतिम ॥६॥

जपेद्गणपतिस्तोत्रं षडभिर्मासे फलं लभेत्
संवत्सरेण सिध्दीं च लभते नात्र संशय: ॥७॥

अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा य: समर्पयेत
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादत: ॥८॥

।। इतिश्रीनारदपुराणे संकटनाशननाम गणेशद्वादशनामस्तोत्रं सम्पूर्णम्।।

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|| दुर्गादेवीची आरती || – Maa Durga Aarti


                 || Maa Durga Aarti ||

Durga Aarti

दुर्गे दुर्घट भारी तुजविण संसारीं । अनाथ नाथे अंबे करुणा विस्तारीं ॥ वारीं वारीं जन्ममरणातें वारीं । हारीं पडलों आतां संकट नीवारीं ॥ १ ॥

जय देवी जय देवी महिषासुरमथिनी । सुरवरईश्वरवरदे तारक संजिवनी ॥ ध्रु० ॥


त्रिभुवनीं भुवनीं पाहतां तुज ऐसी नाहीं । चारी श्रमले परंतु न बोलवे कांहीं ॥ साही विवाद करितां पडिले प्रवाहीं । ते तूम भक्तांलागीं पावसि लवलाहीं  ॥ २ ॥

जय देवी जय देवी महिषासुरमथिनी । सुरवरईश्वरवरदे तारक संजिवनी ॥ ध्रु० ॥

प्रसन्नवदनें प्रसन्न होसी निजदासां । क्लेशापासुनि सोडीं तोडीं भवपाशा ॥ अंबे तुजवांचून कोण पुरविल आशा नरहरि तल्लीन झाला पदपंकजलेशा ॥ ३ ॥

जय देवी जय देवी महिषासुरमथिनी । सुरवरईश्वरवरदे तारक संजिवनी ॥ ध्रु० ॥



|| Durga Aarti Lyrics in English ||

Durge durghat bhari tujvin sansari ||
Anathnathe ambe karuna vistari ||
Vari vari janam marante vari ||
Hari padalo ata sankat nivari || 1 ||
Jaya devi jaya devi mahisha surmathini ||
Survar ishwar varde tarak sanjivani || Rep.||
Tujaveen bhuvani pahata tuj aise nahi ||
Chari shramale parantu n bolve kahi ||
Sahi vivad karita padile pravahi ||
Te tu bhaktalagi pavasi lavlahi || 2 ||
Jaya devi jaya devi mahisha surmathini ||
Survar ishwar varde tarak sanjivani || Rep.||


Prasanna vadane prasanna hosi nijdasa ||
Kleshapasuni sodivi todi bhavpasha ||
Ambe tujvachun kon purvil asha ||
Narhari tallin jhala padpankajlesha || 3 ||

Jaya devi jaya devi mahisha surmathini ||
Survar ishwar varde tarak sanjivani || Rep.||

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|| श्री सत्यनारायण आरती || – Shree Satyanarayan Pooja Aarti


|| Shri Satyanarayan Pooja Aarti ||

Satyanarayan Pooja

जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा
सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ||

रतन जड़ित सिंहासन, अदभुत छवि राजे
नारद करत नीराजन, घंटा वन बाजे
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ||

प्रकट भए कलिकारण, द्विज को दरस दियो
बूढ़ो ब्राह्मण बनकर, कंचन महल कियो
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ||

दुर्बल भील कठोरो, जिन पर कृपा करी
चंद्रचूड़ एक राजा, तिनकी विपत्ति हरि
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ||

वैश्य मनोरथ पायो, श्रद्धा तज दीन्ही
सो फल भाग्यो प्रभुजी, फिर स्तुति किन्ही
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ||

भव भक्ति के कारण, छिन-छिन रूप धरयो
श्रद्धा धारण किन्ही, तिनको काज सरो
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ||

ग्वाल-बाल संग राजा, बन में भक्ति करी
मनवांछित फल दीन्हो, दीन दयालु हरि
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ||

चढत प्रसाद सवायो, कदली फल मेवा
धूप-दीप-तुलसी से, राजी सत्यदेवा
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ||

सत्यनारायणजी की आरती जो कोई नर गावे
ऋषि-सिद्ध सुख-संपत्ति सहज रूप पावे
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ||

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|| श्री रामचंद्राची आरती || – Shri Ramchandra Kripalu Aarti


                    || Shri Ramchandra Kripalu Aarti ||

shri ramchandra kripalu

उत्कट साधुनि शिळा सेतू बांधोनी ।
लिंगदेह-लंकापुरि विध्वंसूनी ॥
कामक्रोधादिक राक्षस मर्दूनी ।
देह-अहंभाव रावण निवटोनी ॥ १ ॥
जय एव जय देव निजबोधा रामा ।
परमार्थे आरती सद्भावें आरती परिपूर्णकामा ॥ध्रु० ॥

प्रथम सीताशुद्धी हनुमंत गेला ।
लंका दहन करुनी अखया मारिला ॥
मारिला जंबूमाळी बुवनीं त्राहाटीला ।
आनंदाची गुढी घेउनियां अला ॥ जय० ॥ २ ॥

निजबळें निजशक्ति सोडविली सीता ।
म्हणुनी येणें झालें आयोध्यें रघुनाथा ॥
आनंदें वोसंडे वैराग्य भरता ।
आरति घेउनि आली कौसल्या माता ॥ जय० ॥ ३ ॥

अनुहतवादित्रध्वनि गर्जति अपार ।
अठरा पद्मे वानर करिती भुभुःकार ॥
अयोध्येसी आले दशरथकुमार ।
नगरीं होत आहे आनंद थोर ॥ जय० ॥ ४ ॥

सहज सिंहासनीं राजा रघुवीर ।
सोहंभावें तया पूजा उपचार ।
सहजांची आरती वाद्यांचा गजर ।
माधवदासा स्वामी आठवे ना विसर ॥ जय० ॥ ५ ॥

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